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मीर तक़ी मीर: दिल के जाने का निहायत ग़म रहा

mir taqi mir famous ghazal gham raha jab tak ki dum mein dum raha
                
                                                         
                            


ग़म रहा जब तक कि दम में दम रहा
दिल के जाने का निहायत ग़म रहा

हुस्न था तेरा बहुत आलम-फ़रेब
ख़त के आने पर भी इक आलम रहा

दिल न पहुँचा गोशा-ए-दामाँ तलक
क़तरा-ए-ख़ूँ था मिज़ा पर जम रहा

सुनते हैं लैला के ख़ेमे को सियाह
उस में मजनूँ का मगर मातम रहा

जामा-ए-एहराम-ए-ज़ाहिद पर न जा
था हरम में लेक ना-महरम रहा

ज़ुल्फ़ें खोलीं तो तू टुक आया नज़र
उम्र भर याँ काम-ए-दिल बरहम रहा

उस के लब से तल्ख़ हम सुनते रहे
अपने हक़ में आब-ए-हैवाँ सम रहा

मेरे रोने की हक़ीक़त जिस में थी
एक मुद्दत तक वो काग़ज़ नम रहा

सुब्ह-ए-पीरी शाम होने आई 'मीर'
तू न चेता याँ बहुत दिन कम रहा

3 महीने पहले

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