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मेहदी हसन की गाई हुई मशहूर ग़ज़ल: मैं कब का जा चुका हूँ

उर्दू अदब
                
                                                         
                            शो'ला था जल-बुझा हूँ हवाएँ मुझे न दो 
                                                                 
                            
मैं कब का जा चुका हूँ सदाएँ मुझे न दो 

जो ज़हर पी चुका हूँ तुम्हीं ने मुझे दिया 
अब तुम तो ज़िंदगी की दुआएँ मुझे न दो 

ये भी बड़ा करम है सलामत है जिस्म अभी 
ऐ ख़ुसरवान-ए-शहर क़बाएँ मुझे न दो 

ऐसा न हो कभी कि पलट कर न आ सकूँ 
हर बार दूर जा के सदाएँ मुझे न दो 

कब मुझ को ए'तिराफ़-ए-मोहब्बत न था 'फ़राज़' 
कब मैं ने ये कहा है सज़ाएँ मुझे न दो 

~ अहमद फ़राज़ की 
2 वर्ष पहले

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