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लक्ष्मण गुप्त की ग़ज़ल: हर घड़ी दोस्तों को न परखा करो

उर्दू अदब
                
                                                         
                            गीत हो या ग़ज़ल गुनगुनाया करो
                                                                 
                            
ग़म में भी यार तुम मुस्कुराया करो

हर घड़ी दोस्तों को न परखा करो
दुश्मनों को कभी आज़माया करो

ज़िंदगी का तजुर्बा है कहता यही
ख़ुद को अपनी नज़र से बचाया करो

है ज़रूरी सफ़र ज़िंदगी में मगर
वक़्त घर में भी साहब बिताया करो

गाँव तक जिसकी ख़ुश्बू पहुँचती रहे
शहर में नाम इतना कमाया करो

मौत के बाद भी वो तमाशा चले
कोई किरदार ऐसा निभाया करो

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3 महीने पहले

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