आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

कुमार नवीन: जंतर-मंतर पे ले आएगी सियासत तुमको

उर्दू अदब
                
                                                         
                            न रहनुमा, न कोई कारवाँ तलाश करो,
                                                                 
                            
तुम अपनी मंज़िलों के ख़ुद निशाँ तलाश करो।

जंतर-मंतर पे ले आएगी सियासत तुमको,
तुम अपने वास्ते अपना जहाँ तलाश करो।

तुम्हारे बाद तुम्हारा ही घर उजड़ना है,
ख़ुदकुशी छोड़कर दर्द-ए-निहाँ तलाश करो।

नींद तो मौत का छोटा-सा एक ट्रेलर है,
जागती आँख में कोई समाँ तलाश करो।

इश्क़ में ज़्यादा वज़ाहत नहीं होती अच्छी,
दिलों के दरमियाँ थोड़ा धुआँ तलाश करो।

जिस्म मिट्टी का है, ढल जाएगा, इससे पहले,
इसकी गहराई में रूह-ए-रवाँ तलाश करो।

निकल आओ ज़रा दुनिया की बदगुमानी से,
नई ज़मीन, नया आस्माँ तलाश करो।

ढल गई उम्र मगर दिल तो है "नवीन" वही,
आरज़ू फिर से कोई नौजवाँ तलाश करो।

हमारे यूट्यूब चैनल को Subscribe करें।

3 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर