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ख़ुर्शीद अहमद जामी की ग़ज़ल: कोई हलचल है न आहट न सदा है कोई 

उर्दू अदब
                
                                                         
                            कोई हलचल है न आहट न सदा है कोई 
                                                                 
                            
दिल की दहलीज़ पे चुप-चाप खड़ा है कोई 

एक इक कर के उभरती हैं कई तस्वीरें 
सर झुकाए हुए कुछ सोच रहा है कोई 

ग़म की वादी है न यादों का सुलगता जंगल 
हाए ऐसे में कहाँ छोड़ गया है कोई 

याद-ए-माज़ी की पुर-असरार हसीं गलियों में 
मेरे हमराह अभी घूम रहा है कोई 

जब भी देखा है किसी प्यार का आँसू 'जामी' 
मैं ने जाना मिरे नज़दीक हुआ है कोई 
5 वर्ष पहले

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