दर-ओ-दीवार पे शक्लें सी बनाने आई
फिर ये बारिश मेरी तन्हाई चुराने आई
ज़िंदगी बाप की मानिंद सज़ा देती है
रहम-दिल माँ की तरह मौत बचाने आई
आज कल फिर दिल-ए-बर्बाद की बातें हैं वही
हम तो समझे थे कि कुछ अक़्ल ठिकाने आई
दिल में आहट सी हुई रूह में दस्तक गूँजी
किस की ख़ुश-बू ये मुझे मेरे सिरहाने आई
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