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Kaif Bhopali Shayari: तेरी मानिंद तिरी याद भी ज़ालिम निकली

उर्दू अदब
                
                                                         
                            दर-ओ-दीवार पे शक्लें सी बनाने आई 
                                                                 
                            
फिर ये बारिश मेरी तन्हाई चुराने आई 

ज़िंदगी बाप की मानिंद सज़ा देती है 
रहम-दिल माँ की तरह मौत बचाने आई 

आज कल फिर दिल-ए-बर्बाद की बातें हैं वही 
हम तो समझे थे कि कुछ अक़्ल ठिकाने आई 

दिल में आहट सी हुई रूह में दस्तक गूँजी 
किस की ख़ुश-बू ये मुझे मेरे सिरहाने आई 

मैं ने जब पहले-पहल अपना वतन छोड़ा था 
दूर तक मुझ को इक आवाज़ बुलाने आई 

तेरी मानिंद तिरी याद भी ज़ालिम निकली 
जब भी आई है मिरा दिल ही दुखाने आई 

2 वर्ष पहले

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