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कैफ़ भोपाली: ज़िंदगी शायद इसी का नाम है दूरियाँ मजबूरियाँ तन्हाइयाँ

उर्दू अदब
                
                                                         
                            हाए लोगों की करम-फ़रमाइयाँ 
                                                                 
                            
तोहमतें बदनामियाँ रुस्वाइयाँ 

ज़िंदगी शायद इसी का नाम है 
दूरियाँ मजबूरियाँ तन्हाइयाँ 

क्या ज़माने में यूँ ही कटती है रात 
करवटें बेताबियाँ अंगड़ाइयाँ 

क्या यही होती है शाम-ए-इंतिज़ार 
आहटें घबराहटें परछाइयाँ 

एक रिंद-ए-मस्त की ठोकर में हैं 
शाहियाँ सुल्तानियाँ दाराइयाँ 

एक पैकर में सिमट कर रह गईं 
ख़ूबियाँ ज़ेबाइयाँ रानाइयाँ 

रह गईं इक तिफ़्ल-ए-मकतब के हुज़ूर 
हिकमतें आगाहियाँ दानाइयाँ 

ज़ख़्म दिल के फिर हरे करने लगीं 
बदलियाँ बरखा रुतें पुरवाइयाँ 
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4 वर्ष पहले

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