हाए लोगों की करम-फ़रमाइयाँ
तोहमतें बदनामियाँ रुस्वाइयाँ
ज़िंदगी शायद इसी का नाम है
दूरियाँ मजबूरियाँ तन्हाइयाँ
क्या ज़माने में यूँ ही कटती है रात
करवटें बेताबियाँ अंगड़ाइयाँ
क्या यही होती है शाम-ए-इंतिज़ार
आहटें घबराहटें परछाइयाँ
एक रिंद-ए-मस्त की ठोकर में हैं
शाहियाँ सुल्तानियाँ दाराइयाँ
एक पैकर में सिमट कर रह गईं
ख़ूबियाँ ज़ेबाइयाँ रानाइयाँ
रह गईं इक तिफ़्ल-ए-मकतब के हुज़ूर
हिकमतें आगाहियाँ दानाइयाँ
ज़ख़्म दिल के फिर हरे करने लगीं
बदलियाँ बरखा रुतें पुरवाइयाँ
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