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मुस्कराने से अमलतास भी खिल उठता था
दोस्त के हँसते ही आकाश भी खिल उठता था
उसके आने से आ जाती थी घर में रौनक़
उसके होने से मधुमास भी खिल उठता था
ऐसे मिलता था वो जन्मों से हो रिश्ता जैसे
पास बैठा हुआ उल्लास भी खिल उठता था
उसकी यादों में मुकम्मल-सा जहाँ है अपना
उसके होने का अहसास भी खिल उठता था
छेनी से उसकी तराशी थी कुछ ऐसी मूरत
उसकी जुंबिश से नक्क़ाश भी खिल उठता था
हाथ रखता था वो यूं काँधे पे करीने से
उसके छूने से विश्वास भी खिल उठता था
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