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हबीब जालिब की ग़ज़ल: कुछ लोग ख़यालों से चले जाएँ तो सोएँ

उर्दू अदब
                
                                                         
                            कुछ लोग ख़यालों से चले जाएँ तो सोएँ
                                                                 
                            
बीते हुए दिन रात न याद आएँ तो सोएँ

चेहरे जो कभी हम को दिखाई नहीं देंगे
आ आ के तसव्वुर में न तड़पाएँ तो सोएँ

बरसात की रुत के वो तरब-रेज़ मनाज़िर
सीने में न इक आग सी भड़काएँ तो सोएँ

सुब्हों के मुक़द्दर को जगाते हुए मुखड़े
आँचल जो निगाहों में न लहराएँ तो सोएँ

महसूस ये होता है अभी जाग रहे हैं
लाहौर के सब यार भी सो जाएँ तो सोएँ

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22 घंटे पहले

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