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फ़रहत एहसास की ग़ज़ल: है शोर साहिलों पर सैलाब आ रहा है

उर्दू अदब
                
                                                         
                            है शोर साहिलों पर सैलाब आ रहा है
                                                                 
                            
आँखों को ग़र्क़ करने फिर ख़्वाब आ रहा है

बस एक जिस्म दे कर रुख़्सत किया था उस ने
और ये कहा था बाक़ी अस्बाब आ रहा है

ख़ाक-ए-विसाल क्या क्या सूरत बदल रही है
सूरज गुज़र चुका है महताब आ रहा है

पानी के आइने में क्या आँख पड़ गई है
दरिया में कैसा कैसा गिर्दाब आ रहा है

आँखों की प्यालियों में बारिश मची हुई है
सहरा में कोई मंज़र शादाब आ रहा है

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एक घंटा पहले

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