भवें तनती हैं ख़ंजर हाथ में है तन के बैठे हैं
किसी से आज बिगड़ी है कि वो यूँ बन के बैठे हैं
दिलों पर सैकड़ों सिक्के तिरे जोबन के बैठे हैं
कलेजों पर हज़ारों तीर इस चितवन के बैठे हैं
इलाही क्यूँ नहीं उठती क़यामत माजरा क्या है
हमारे सामने पहलू में वो दुश्मन के बैठे हैं
ये गुस्ताख़ी ये छेड़ अच्छी नहीं है ऐ दिल-ए-नादाँ
अभी फिर रूठ जाएँगे अभी तो मन के बैठे हैं
असर है जज़्ब-ए-उल्फ़त में तो खिंच कर आ ही जाएँगे
हमें पर्वा नहीं हम से अगर वो तन के बैठे हैं
सुबुक हो जाएँगे गर जाएँगे वो बज़्म-ए-दुश्मन में
कि जब तक घर में बैठे हैं वो लाखों मन के बैठे हैं
फ़ुसूँ है या दुआ है या मुअ'म्मा खुल नहीं सकता
वो कुछ पढ़ते हुए आगे मिरे मदफ़न के बैठे हैं
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