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अनवर मसूद की ग़ज़ल: क्यूँ किसी और को दुख दर्द सुनाऊँ अपने

उर्दू अदब
                
                                                         
                            क्यूँ किसी और को दुख दर्द सुनाऊँ अपने
                                                                 
                            
अपनी आँखों से भी मैं ज़ख़्म छुपाऊँ अपने

मैं तो क़ाएम हूँ तिरे ग़म की बदौलत वर्ना
यूँ बिखर जाऊँ कि ख़ुद हाथ न आऊँ अपने

शेर लोगों के बहुत याद हैं औरों के लिए
तू मिले तो मैं तुझे शेर सुनाऊँ अपने

तेरे रस्ते का जो काँटा भी मयस्सर आए
मैं उसे शौक़ से कॉलर पर सजाऊँ अपने

सोचता हूँ कि बुझा दूँ में ये कमरे का दिया
अपने साए को भी क्यूँ साथ जगाऊँ अपने

उस की तलवार ने वो चाल चली है अब के
पाँव कटते हैं अगर हाथ बचाऊँ अपने

आख़िरी बात मुझे याद है उस की 'अनवर'
जाने वाले को गले से न लगाऊँ अपने

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4 घंटे पहले

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