आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

अमित झा राही: उतर रही है तिरे तन से झील में बिजली

उर्दू अदब
                
                                                         
                            भरी है तैर के ऊँची उड़ान पानी में
                                                                 
                            
गो मछलियों का हो इक आसमान पानी में

उतर रही है तिरे तन से झील में बिजली
निकल न जाए कहीं मेरी जान पानी में

तमाशबीन थी जनता तमाशबीन रही
नगर के डूब गए सब मकान पानी में

जमी हुई है ये नद्दी पिघल भी जाने दो
उतर के आओ कभी मेरी जान पानी में

मैं जल-परी हूँ सितारों से मुझ को क्या मतलब
मिरी ज़मीन मिरा आसमान पानी में

यक़ीन झूटी गवाही का कर लिया सब ने
बिलकते रह गए ख़ूँ के निशान पानी में

हमारे यूट्यूब चैनल को Subscribe करें।

2 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर