'हिंदी हैं हम' शब्द शृंखला में आज का शब्द है- मग, जिसका अर्थ है- रास्ता, राह। प्रस्तुत है गोपालदास नीरज की कविता- मत करो प्रिय! रूप का अभिमान
मत करो प्रिय! रूप का अभिमान
कब्र है धरती, कफ़न है आसमान।
हर पखेरू का यहाँ है नीड़ मरघट पर
है बँधी हर एक नैया, मृत्यु के तट पर
खुद बखुद चलती हुई ये देह अर्थी है
प्राण है प्यासा पथिक संसार-पनघट पर
किसलिए फ़िर प्यास का अपमान?
जी रहा है प्यास पी-२ कर जहान।
मत करो प्रिय! रूप का अभिमान
कब्र है धरती, कफ़न है आसमान।
भूमि से, नभ से, नरक से, स्वर्ग से भी दूर
हो कहीं इन्सान, पर है मौत से मजबूर
धूर सब कुछ, इस मरण की राजधानी में
सिर्फ़ अक्षय है, किसी की प्रीति का सिन्दूर
किसलिए फ़िर प्यार का अपमान?
प्यार है तो ज़िन्दगी हरदम जवान।
मत करो प्रिय ! रूप का अभिमान
कब्र है धरती, कफ़न है आसमान।
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