आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

आज का शब्द: कृति और मैथिलीशरण गुप्त की कविता- मेरा देश

आज का शब्द
                
                                                         
                            'हिंदी हैं हम' शब्द शृंखला में आज का शब्द है- कृति, जिसका अर्थ है- किया हुआ काम, कार्य,  चित्र, ग्रन्थ, वास्तु आदि के रूप में बनाई हुई वस्तु। प्रस्तुत है मैथिलीशरण गुप्त की कविता- मेरा देश 
                                                                 
                            

बलिहारी तेरा वरवेश, 
मेरे भारत! मेरे देश! 

बाहर मुकुट विभूषित भाल, 
भीतर जटा-जूट का जाल। 
ऊपर नभ, नीचे पाताल, 
और बीच में तू प्रणपाल। 
बंधन में भी मुक्ति निवेश, 
मेरे भारत! मेरे देश! 

कभी मुरज-मय वीणावाद, 
कभी स्वरों से साम-निनाद। 
कभी गगनचुंबी प्रासाद, 
कभी कुटी में ही आह्लाद। 
नहीं कहीं भी भय का लेश, 
मेरे भारत! मेरे देश! 

है तेरी कृति में विक्रांति, 
भरी प्रकृति में निश्चल शांति। 
फटक नहीं सकती है भ्रांति, 
आँखों में है अक्षय क्रांति, 
आत्मा में है अज अखिलेश, 
मेरे भारत! मेरे देश!  आगे पढ़ें

2 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर