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उदयप्रताप सिंह: ख़ुशबू नहीं प्यार की महकी जिनके सोच-विचारों में

उर्दू अदब
                
                                                         
                            ख़ुशबू नहीं प्यार की महकी जिनके सोच-विचारों में 
                                                                 
                            
नागफनी की चुभन मिली उनके दैनिक व्यवहारों में ।

तू पतझर के पीले पत्तों पर पग धरते डरता है
लोग सफलता खोज चुके हैं लाशों के अंबारों में ।

महलों के रहने वाले कुछ दूरी रखकर मिलते हैं
पल-भर में घुल-मिल जाते हैं बंजारे बंजारों में ।

औरत ही माँ, बहन, आत्मजा, पत्नी और प्रेमिका है
बदली नज़रों से पड़ता है, कितना फ़र्क नज़ारों में ।

अगर उजाला दे न सका तू ‘उदय’ अंधेरी बस्ती को
क्या होगा यदि लिख भी गया कल नाम तेरा फ़नकारों में ।

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54 मिनट पहले

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