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तुलसीदास के 5 चुनिंदा दोहे

साहित्य
                
                                                                                 
                            दुर्जन दर्पण सम सदा, करि देखौ हिय गौर। 
                                                                                                

संमुख की गति और है, विमुख भए पर और॥ 


भावार्थ:- दुर्जन शीशे के समान होते हैं, इस बात को ध्यान से देख लो, क्योंकि दोनों ही जब सामने होते हैं तब तो और होते हैं और जब पीछ पीछे होते हैं तब कुछ और हो जाते हैं। भाव यह है कि दुष्ट पुरुष सामने तो मनुष्य की प्रशंसा करता है और पीठ पीछे निंदा करता है, इसी प्रकार शीशा भी जब सामने होता है तो वह मनुष्य के मुख को प्रतिबिंबित करता है; पर जब वह पीठ पीछे होता है तो प्रतिबिंबित नहीं करता।
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4 months ago

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