गांधी को याद करना आसान है, गांधी को समझना कठिन। हर वर्ष 2 अक्टूबर को हम उनके चित्र पर माल्यार्पण करते हैं, उनके प्रिय भजनों को सुनते हैं और सत्य-अहिंसा के उनके संदेश को दोहराते हैं। लेकिन असली सवाल यह है कि जिस दुनिया में हिंसा, असहिष्णुता, उपभोग और स्वार्थ लगातार बढ़ रहे हैं, उस दुनिया में गांधी के विचार हमारे लिए क्या अर्थ रखते हैं?
गांधी की प्रासंगिकता केवल इसलिए नहीं है कि वे भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के महानायक थे। उनका महत्व इस बात में भी है कि उन्होंने राजनीति को नैतिकता से, स्वतंत्रता को जिम्मेदारी से और विकास को अंतिम व्यक्ति के जीवन से जोड़कर देखा। उनके लिए स्वराज केवल सत्ता परिवर्तन नहीं था; वह ऐसा समाज बनाने की कल्पना थी जिसमें गरीब, किसान, मजदूर, स्त्री और वंचित व्यक्ति भी सम्मान के साथ जीवन जी सके। साहित्य में कविताओं में भी लोगों लोगों ने गाँधी को अपने अपने ढंग से समझा और दर्द किया, आइए आज हिंदी कविता में गाँधी की उपस्थिति हो देखते समझते हैं, इसमें हिंदी के नामचीन कवियों के उन कविताओं के अंश पढ़ूँगा जो महात्मा गाँधी से संबंधित है-
चल पड़े जिधर दो डग, मग में
चल पड़े कोटि पग उसी ओर ;
गड़ गई जिधर भी एक दृष्टि
गड़ गए कोटि दृग उसी ओर,
जिसके शिर पर निज हाथ धरा
उसके शिर- रक्षक कोटि हाथ
जिस पर निज मस्तक झुका दिया
झुक गए उसी पर कोटि माथ
~ सोहनलाल द्विवेदी
तुम काग़ज़ पर लिखते हो
वह सड़क झाड़ता है
तुम व्यापारी
वह धरती में बीज गाड़ता है ।
एक आदमी घड़ी बनाता
एक बनाता चप्पल
इसीलिए यह बड़ा और वह छोटा
इसमें क्या बल ।
सूत कातते थे गाँधी जी
कपड़ा बुनते थे ,
और कपास जुलाहों के जैसा ही
धुनते थे
चुनते थे अनाज के कंकर
चक्की पीसते थे
आश्रम के अनाज याने
आश्रम में पिसते थे
जिल्द बाँध लेना पुस्तक की
उनको आता था
भंगी-काम सफाई से
नित करना भाता था ।
ऐसे थे गाँधी जी
ऐसा था उनका आश्रम
गाँधी जी के लेखे
पूजा के समान था श्रम ।
एक बार उत्साह-ग्रस्त
कोई वकील साहब
जब पहुँचे मिलने
बापूजी पीस रहे थे तब ।
बापूजी ने कहा - बैठिये
पीसेंगे मिलकर
जब वे झिझके
गाँधीजी ने कहा
और खिलकर
सेवा का हर काम
हमारा ईश्वर है भाई
बैठ गये वे दबसट में
पर अक्ल नहीं आई ।
~ भवानीप्रसाद मिश्र
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