कवि रूपन जी बनारस के लोकप्रिय कजरी गायक थे। आपका समय 20वीं सदी का प्रारंभ था। आपकी बहुत सारी रचनाएँ अभी अप्राप्य हैं लेकिन जो मिली हैं उनमें प्रस्तुत है एक कजरी-
पिया तजके हमें गइले परदेसवा ना
गए हमसे कर के घात, सुनऽ सौतिन के साथ,
नाहीं भेजलऽ जबसे गइले संदेशवा ना
पिया तजके हमें...
भावार्थ:- पिया हमको छोड़ कर परदेस चले गए हैं, उन्होंने हमारे साथ धोखा किया है और सुना है सौतिन साथ गए हैं। और तो और जब से गए हैं तब से कोई संदेश भी नहीं भेजा है।
नाहिं कल दिन रात, जबसे चढ़ल बरसात
नाहिं कल दिन रात, जबसे चढ़ल बरसात
कब अइहें मोहिं एही, बा अंदेसवा ना
झींगुर बोले झनकार, सुनके पपिहा पुकार,
गोइयाँ बढ़ गइले जिगर में कलेसवा ना
पिया तजके हमें...
भावार्थ:- जब से बरसात चढ़ी है, दिन-रात कभी भी करार नहीं है, अब आएंगे या नहीं आएंगे मुझे इसका अंदेशा हो रहा है। झींगुर की झनकार बोल रही है और पपिहा की पुकार सुन सखि मेरे जिगर का क्लेश बढ़ रहा है।
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