हिंदू घरानों का विधवा समुदाय आज कितना उद्वेलित हो रहा है, इसका पता आज वेद-शास्त्रों के पन्ने पलटने से नहीं होगा। पोथी बंद करके आँखें बंद कीजिए और ध्यानस्थ होकर हिंदू समाज के अंदर अधिकार हीन व अवलंब हीन कलपने वाली विधवाओं की दशा पर विचार कीजिए, तब अपनी अंतरात्मा से पूछिए कि मनुष्यता का तकाजा क्या है?
जब देश में वेदों की ओर लौटने की बात पर जोरों पर थी और समाज में विधवा विवाह की मनाही थी, तब वर्ष 1927 में हिंदी नवजागरण के अग्रदूत और जाने-माने साहित्यकार व संपादक आचार्य शिवपूजन सहाय ने 'विधवा विवाह समस्या' निबंध लिखकर विधवा विवाह के समर्थन में अपने क्रांतिकारी विचारों से जन जागरण किया।
आज 9 अगस्त को शिवपूजन सहाय जी की जयंती पर हम उनका भावपूर्ण स्मरण कर रहे हैं तो आपको बता दें कि बाल विवाह जैसी कुरीति के विरोध में भी आचार्य जी पीछे नहीं रहे। उन्होंने हतभागिनी और चंद्रतारा कहानी में बाल विवाह के औचित्य पर प्रश्न खड़ा किया, वहीं कहानी 'अनूठी अँगूठी' में वह कहते हैं:-
" हमारा यौवन रूप ब्रह्मचर्य-वसंत से विकसित था। तुम्हारा यौवन बाल विवाह के पतझड़ से शुष्क है।"
स्वतंत्रता आंदोलन में भी रहे सक्रिय
उन दिनों शिवपूजन युवा थे। देश में गाँधी जी के नेतृत्व में आजादी की लहर चल रही थी। ऐसे में युवक शिवपूजन ने भी गाँव-गाँव जाकर कांग्रेस का संदेश दिया और आजादी की लड़ाई में देशभक्त की तरह योगदान दिया।
वर्ष 1920 में गाँधी जी के असहयोग आंदोलन से प्रभावित होकर आपने स्कूल की सरकारी नौकरी से इस्तीफा दे दिया और राष्ट्रीय आंदोलन में अपनी कलम को हथियार बनाकर शामिल हो गए।
आजादी की लड़ाई के दौरान स्वामी सहजानंद सरस्वती के नेतृत्व में हुए देश के पहले संगठित किसान आंदोलन में भी अपने भाग लिया था। इस ऐतिहासिक तथ्य के बारे में आपके निधन के 61 वर्ष बाद अभी हाल ही में तब पता चला जब स्वामी सहजानंद सरस्वती को लिखे आपके दो पत्र अमेरिका के प्रसिद्ध समाज विज्ञानी बाल्टर हाउजर के पत्र-संग्रह में मिले।
हिंदी भाषा और साहित्य को दिया माता-पिता जैसा सम्मान
आचार्य शिवपूजन सहाय का जन्म बिहार में जिला बक्सर के गांव उनवांस में हुआ था। आपके पिता बागीश्वरी जी पटवारी थे और माँ राजकुमारी देवी धार्मिक विचारों की महिला थीं। आप गाँव के छोटे से पुश्तैनी मकान में रहते थे। आपने हिंदी भाषा और साहित्य को अपने माता-पिता जैसा ही सम्मान दिया और गाँव के उस छोटे से घर में माता-पिता की स्मृति में उनके नाम से एक पुस्तकालय बनाया जहाँ आज भी तमाम दुर्लभ साहित्यिक ग्रंथ मौजूद हैं। शिवपूजन जी पुस्तक संस्कृति के पक्षधर थे। आप पुस्तकालयों व संग्रहालयों की स्थापना व संरक्षण पर आजीवन बल देते रहे।
किसी भी राष्ट्र या जाति में संजीवनी शक्ति भरने का काम साहित्य ही करता है..
वर्ष 1942 में लखनऊ से प्रकाशित 'माधुरी' पत्रिका में आपका एक निबंध 'साहित्य' शीर्षक से प्रकाशित हुआ, जिसको साहित्य जगत में खासी सराहना मिली। आपने साहित्य को परिभाषित करते हुए लिखा:-
" साहित्य बड़ा ही व्यापक अर्थ रखने वाला एक महान गौरवपूर्ण शब्द है। यह विश्वजनीन भाव का द्योतक है। विश्व बंधुत्व का संदेश वाहक है। देश और जाति के जीवन का रस है। समाज की आंतरिक दशा का दिव्य दर्पण है। सभ्यता और संस्कृति का संरक्षक है। इसमें सहित का भाव है। अतएव यह अपने में सब कुछ समेटे हुए हैं जो मानव जाति के जीवन के लिए हितकर, सुखकर और श्रेयस्कर है।"
आपने साहित्य को संरक्षित करने का संदेश देते हुए कहा:-
" किसी भी राष्ट्र या जाति में संजीवनी शक्ति भरने का काम साहित्य ही करता है। इसलिए यह सर्वतोभावेन संरक्षणीय है। अगर सब कुछ खोकर भी हम इसे बचा लेंगे तो सब कुछ पुनः प्राप्त कर लेंगे। हमारा साहित्य विश्व साहित्य का मेरुदंड है।"
भाषा खिलवाड़ करने की चीज़ नहीं..
आचार्य शिवपूजन सहाय जीवन भर हिंदी भाषा के उन्नयन और प्रचार-प्रसार में जुटे रहे। वे भाषा की शुद्धता के प्रति सतर्क और जागरूक थे। यही वज़ह रही कि माधुरी, बालक, जागरण, मतवाला और साहित्य सहित कई पत्रिकाओं का संपादन करने का उन्हें अवसर मिला। हिंदी के उस समय के तमाम जाने-माने साहित्यकारों की रचनाओं में भाषा परिमार्जन का काम भी आप तन्मयता के साथ करते थे। मुंशी प्रेमचंद की रंगभूमि समेत कई कहानियों, जयशंकर प्रसाद की कामायनी और भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद की आत्मकथा को भी शिवपूजन सहाय जी की पारखी नज़र से गुजरने का अवसर मिला।
भाषा के संबंध में एक जगह सहाय जी लिखते हैं:-
" भाषा खिलवाड़ करने की चीज़ नहीं है। भाषा बड़ी नाजुक चीज़ है। उसका रूप सँवारने की कला कथा-रचना की कला से भिन्न है। उसके साथ मनमानी छेड़खानी साहित्य की मर्यादा भ्रष्ट करती है।"
कथा-साहित्य के विकास में निभाई अहम भूमिका
आचार्य शिवपूजन सहाय ने कथा-साहित्य के विकास में अहम भूमिका का निर्वाह किया। आपकी गणना हिंदी के प्रारंभिक कथाकारों में की जाती है। आपके उपन्यास 'देहाती दुनिया' को हिंदी का प्रथम आँचलिक उपन्यास कहा जाता है। आपकी कहानी 'माता का आँचल' पाठ्यक्रम का हिस्सा है।
आपकी प्रमुख कृतियों में विभूति, मेरा जीवन, स्मृति-शेष, हिंदी भाषा और साहित्य, जीवन दर्पण, वे दिन वे लोग, बिंब प्रतिबिंब, कहानी का प्लॉट और तूती-मैना शामिल हैं।
मिला पद्म भूषण, जारी हुआ डाक टिकट
वर्ष 1960 में साहित्य, शिक्षा और पत्रकारिता के क्षेत्र में आपकी उपलब्धियों को देखते हुए भारत सरकार द्वारा आपको पद्म भूषण से सम्मानित किया गया, हालांकि आर्थिक अभाव में आप उस पुरस्कार को ग्रहण करने दिल्ली नहीं जा सके। वर्ष 1998 में आपके नाम पर भारत सरकार द्वारा डाक टिकट जारी किया गया।
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