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Jagjit Singh: रेडियो ऑन करना, एक अच्छी चाय बनाना औऱ जगजीत सिंह की ग़ज़लें सुनना

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जिंदगी के सफ़र में जो चलते हुए कभी कहीं सुस्ताने का जी करे तो अपना रेडियो ऑन करना, एक अच्छी चाय बनाना औऱ जगजीत सिंह की ग़ज़लें सुनना। मोबाइल के ज़माने में रेडियो की बात सिर्फ़ इसलिए कही कि जगजीत सिंह को सुनने के लिए मन के भीतर उसी तरह का ठहराव चाहिए और ठहराव ना भी हो तो वैसा पाने की इच्छा ज़रूर हो। भागते-दौड़ते मौसमों में जैसे सब कुछ बसंत के उन्माद के लिए ही है वैसे ही सब उसी शांति के लिए ही तो है जहां विचार शून्य हो जाते हैं और भावनाएं स्थिर, मस्तिष्क कभी न देखी गई एक जगह बनाता है, वैसा जगह जहां से हम बिलॉंग करते हैं, जो हमारे होने का स्थाई पता है लेकिन न जाने वो कहां है। 

मैंने कितनी बार ये महसूस किया है और तब ही जब जगजीत सिंह को सुना है। ‘ये जो ज़िंदगी की किताब है, ये किताब भी क्या किताब है’ और पूरी ज़िंदगी एक आवाज़ के सहारे किसी खूंटी पर टंगी महसूस होती है जैसे इस ग़ज़ल के बंद होते ही उसे फिर ओढ़कर चलना होगा। ये तो पहले भी मैंने लिखा है कि जगजीत की आवाज़ कॉलेज के दिनों की दुपहरी के साथ ही मेेरे साथ बंध गई थी। पहले साल की ही तो बात है कि सुन रही थी ‘प्यार का पहला ख़त लिखने में वक़्त तो लगता है’ और तब तक जब कोई ख़त नहीं लिखा था और सामने पेड़ के पत्ते जब हवा से झूम रहे थे तो लगा कि कोई आमद होने वाली है और जगजीत उस पर मुहर लगा रहे हैं। ‘तेरे आने की जब ख़बर महके‘ और ये प्लेलिस्ट में अगला गाना बजा और फिर सब एक कहानी है। 

कभी सोचती हूं कि मजाज़ के कॉलेज में जो लड़कियां उनकी किताब को तकिए में छिपाकर रखती थीं अगर जगजीत उन्हें तब अपनी आवाज़ सुना देते तो वे तो सूफ़ी ही हो जातीं। मन की तरंगों को उनकी दिशा देकर उसमें साज़ छेड़ने का नाम है ये कलाकार तब जो सुने वो सूफ़ी हो भी क्यों ना। जगजीत सिंह ने शिव कुमार बटालवी के दर्द को गाया तो पंजाब के लोकगीत और टप्पे भी गाए। बीते दिनों ही यू्ट्यूब सजेशन में जब ये टप्पे दिखे तो फिर सुना जिसे जगजीत और उनकी पत्नी चित्रा गा रहे हैं। चित्रा अपने भावों को लेकऱ थोड़ी अंतर्मुखी हैं लेकिन जगजीत सिंह बिल्कुल किसी नवयुवक की तरह पूरे मज़े से वे गा रहे हैं। 

ऐसा नहीं कि इस ख़ुशी से वे टप्पे ही गा रहे हैं, बल्कि भजन भी उन्होंने उसी तरह गाए हैं कि लूप पर एक सिस्टम में मंदिर के भीतर राधे-कृष्ण की धुन चलती है। वे जितनी बार गाते हैं जय राधा माधव जय कुंज बिहारी और मन क्षण भर में वृन्दावन की गली में पहुंच जाता है जैसे जगजीत सिंह की आवाज़ में इस धुन को सुनकर ईश्वर की खोज में भटकती एक बुज़ु्र्ग महिला को जल्द ही उसकी भक्ति का पुण्य मिलेगा। जगजीत की आवाज़ सिर्फ़ एक वर्ग और एक तरह के लोगों के लिए थोड़े ही है, ये उन सबके भीतर की आवाज़ है जिनका अध्यात्म किसी प़ड़ाव पर आकर कुछ देर विश्राम करना चाहता है।

इस पड़ाव में चंचलता तो है लेकिन फूहड़ता नहीं है, संगीत है लेकिन तेज़ी नहीं, सुर हैं लेकिन नदी की तरह नहीं सागर की तरह हैं और आप डूबेंगे ही डूबेंगे। दोपहर को अपने पसंदीदा लोगों के साथ बैठकर हम इस सागर में डूबते थे, जब तक सूरज नहीं ढलता था तब तक जगजीत सिंह की आवाज़ किसी सुबह का एहसास करवाती रहती। सूरज ढलने के बाद दिमाग़ भले अपने-अपने कामों में व्यस्त हो जाता था लेकिन मन वही अटका रहता अगली दुपहर तक। मुझे लगता कि आज भी वैसे ही है, थोड़ा फ़र्क़ बस ये हुआ है कि शामें लंबी हो गई हैं और दुपहर की चाह में रहती हैं। 
 
2 वर्ष पहले

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