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फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की शायरी का सफ़रनामा रवीन्द्र कालिया की ज़ुबानी

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की शायरी का सफ़रनामा
                
                                                         
                            ये अंश किताब 'फ़ैज़ की सदी' का है जिसमें रवीन्द्र कलिया बताते हैं कि - 
                                                                 
                            

"फ़ैज़ के अनेक शेर चलते-चलते या यूँ ही चुपचाप बैठे हुए याद आ जाते हैं। मसलन कई बार ऐसा हुआ कि मैं टहलने निकला और देखा कि क्षितिज पर तिर्यक चाँद धीरे-धीरे निकलता आ रहा है। तो फ़ैज़ की यह ग़जल गुनगुनाने को जी करने लगता है...

'चाँद निकले किसी जानिब तिरी ज़ेबाई का
रंग बदले किसी सूरत शब-ए-तन्हाई का'

लेकिन फ़ैज़ साहब केवल चाँद या महताब के शायर नहीं हैं और न साकी, मय और मीना के। उनकी शायरी का सफ़रनामा बहुत लम्बा और विस्तृत है। आज़ादी के पहले दौर में जब लोग शायद फ़ैज़ से बहुत ज़्यादा परिचित नहीं हुए होंगे, उन दिनों उर्दू अदब में जिगर मुरादाबादी, जोश मलीहाबादी, फ़िराक़ और मजाज़ का बोलबाला था। तभी मैंने अचानक हिन्दी की एक पत्रिका में फ़ैज़ की यह छोटी-सी नज़्म पढ़ी....

'फिर कोई आया दिल-ए-ज़ार नहीं कोई नहीं
राह-रौ होगा कहीं और चला जाएगा
अपने बे-ख़्वाब किवाड़ों को मुक़फ़्फ़ल कर लो
अब यहाँ कोई नहीं कोई नहीं आएगा'...
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4 वर्ष पहले

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