अमृतलाल वेगड़ यानी नर्मदा का पुत्र जो वास्तव में ही इस नाम से मशहूर हो गए। जैसे भागीरथ ने गंगा को धरती पर लाकर अपने पूर्वजों का उद्धार किया था ठीक वैसे ही अमृतलाल वेगड़ जी ने नर्मदा-त्रयी लिखकर तमाम नदी-प्रेमियों को तार दिया है। 3 अक्टूबर 1928 को जबलपुर में पैदा हुए अमृतलाल गुजराती और हिंदी भाषा के लेखक हैं हालांकि उनकी पुस्तकें मराठी भी में छपी हैं। ये किताबें नर्मदा नदी की पैदल परिक्रमा का यात्रा-वर्णन हैं। विशेष बात है कि वेगड़ जी ने जब ये यात्रा शुरु की थी तब वे पचास से अधिक उम्र के थे, आख़िरी यात्रा 83 की उम्र में की थी। इन वृत्तांत के लिए उन्हें साहित्य अकादमी सम्मान भी मिला था। त्रयी इसलिए कि पूरी परिक्रमा को तीन किताबों में दर्ज किया गया है - सौंदर्य की नदी नर्मदा, अमृतस्य नर्मदा और तीरे-तीरे नर्मदा।
इन किताबों में पदयात्रा का वर्णन तो है ही, अमृतलाल जी के हाथ से बने रेखाचित्र भी हैं। अनेक वरिष्ठ लेखकों ने इस किताब की भूमिका लिखी है लेकिन इसमें भी निर्मल वर्मा ने जो लिखा है, वो पढ़कर दो बातें ज़हन में रहेंगी, पहली कि किताब पढ़ने के जिज्ञासा जाग्रत होगी दूसरा कि जब आप किताब पूरी कर लेंगे तो महसूस करेंगे कि निर्मल वर्मा ने जो लिखा है वही आप भी अभिव्यक्त करना चाह रहे हैं। नर्मदा जैसी पाविनी और आध्यात्मिक रूप से समृद्ध नदी को सबके सामने अमृत की तरह परोस कर वेगड़ जी ने न जाने कितनी सभ्यताओं को सींच दिया है।
पढ़िए कि निर्मल वर्मा ने इन किताबों पर क्या कहा है।
बहुत साल पहले मैंने पुणे से प्रकाशित होनेवाली पत्रिका 'राष्ट्रवाणी' में मराठी लेखक की पर्यटन कथा पढ़ी थी - उपन्यास और यात्रावृत्त का अद्भुत सम्मिश्रण - जिसमें एक नदी के किनारे बसने वाले लोगों की जीवनगाथा बुनी गई थी।
नदी का प्रवाह और मनुष्य की नियति - दोनों कुछ इस प्रकार से जुड़े थे कि एक को दूसरे से अलग करना अस्म्भव था। कुछ ऐसा ही अविस्मरणीय अनुभव शोलोखोव के अमर उपन्यास 'और चुपचाप डान बहती रही' पढ़कर हुआ था। इन पुस्तकों को पढ़ते हुए मैं सोचा करता था कि अब तक अपनी हिंदी में इस तरह की 'नदी गाथा' पढ़ने को नहीं मिली जो उपन्यास की तरह लोगों के जीवन को अपने चिरंतन प्रवाह में प्रतिबिंबित कर सकें।
तब मुझे क्या मालूम था कि मेरी यह प्रच्छन्न आकांक्षा भोपाल की एक उनींदी दुपहर में अचानक पूरी हो जाएगी। याद नहीं आता कौन मुझे वह छोटी-सी दुबली-पतली किताब दे गया था, जिसके पन्नों पर कहीं-कहीं रेखाचित्र खिंचे थे, किंतु जो चीज आज भी याद रह गई है, वह था, पुस्तक का प्रांजल विनोद भरा, स्वच्छ प्रवाह, प्रवाह में बहता गद्य्। मानो जिस नदी का जादू भरा विवरण उसमें था, स्वयं उस नदी का स्पर्श लेखक की कलम को एक अजीब-सी पवित्रता प्रदान कर गया हो।
हिंदी में यात्रावृत्त पहले भी पढ़े थे, पर अमृतलाल बेगड़ की नर्मदा गाथा की रसमयता का स्वाद कुछ अनोखा ही था। यह एक अनूठा अनुभव था, जहाँ देखनेवाली आँख और दिखाई देनेवाला परिदृश्य इस तरह एकात्म हो जाते थे कि पता नहीं चलता था कहाँ लेखक के शब्द पढ़ते हुए हम स्वयं नर्मदा की स्वर-लहरी में उसकी अपनी आत्मगाथा सुनने लगते हैं।
यह यात्रावृत्त कदाचित् बेगड़जी की नर्मदा-यात्रा का पहला चरण था। इसके बाद जब कभी पत्र-पत्रिकाओं में किसी यात्रालेख या संस्मरण पर बेगड़जी का नाम दिखाई दे जाता, मैं उसे एक साँस में आद्योपांत पढ़कर ही दम लेता। जिस तरह बेगड़जी को नर्मदा परिक्रमा करते हुए खोए हुए यात्री मिल जाते थे, वैसे ही हर अंतराल के बाद मैं भी एक अदृश्य तट यात्री की तरह चुपचाप उनके साथ हो जाता। क्या वह विश्वास करेंगे कि जब वह नदी के किनारों पर गिरते-पड़ते चल रहे थे, दुर्गम चट्टानों को पार कर रहे थे, ठंडी रातों में किसी मंदिर के आँगन में लेटे हुए आकाश में टिमकते हुए तारों को निहार रहे थे - मैं उनके साथ था !
एक अच्छी यात्रा-पुस्तक का यह लक्षण है - उसका जादुई चमत्कार कि लेखक के साथ सिर्फ उसके सहयात्री ही नहीं, पाठकों का एक लंबा काफिला भी साथ हो लेता है, और यदि रास्ता दिखानेवाला बेगड़जी जैसा गाइड हो, तब तो सोने में सुहागा है क्योंकि तब वह नर्मदा के अतुल सौंदर्य को - उसके झरनों, प्रपातों, चट्टानों को - एक निपट नई निगाह से देखने लगता है। क्या कभी हमने सोचा था कि - "प्रवाह नदी का प्रयोजन है। अपने अस्तित्व के लिए उसका बहना ही उसकी अनिवार्यता है, लेकिन प्रपात उसका ऐश्वर्य है, उसका अतिरिक्त प्रदाय है... यह अतिरिक्त प्रदाय ही किसी चीज को सौंदर्य प्रदान करता है। जहाँ प्रयोजन समाप्त होता है, वहाँ सौंदर्य शुरू होता है।" (जोर मेरा)
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