हिंदी फ़िल्मों में प्राकृतिक सौंदर्य का वर्णन बेहतर ढंग से किया गया है। नायक-नायिकाओं और प्रेम के जरिए प्रकृति की ख़ूबसूरती इन गीतों में झलकती है। पर्वतों के किनारे कलरव करते झरने या नदियां हों या फूलों से भरी बगिया हो, गीतों में प्रकृति के सभी तरह के मनोरम दृश्य पेश किए गए हैं। इन गीतों को सुनकर और देखकर मन सौंदर्य की वादियों में रम जाता है। इस खंड में हम हिंदी फ़िल्मों के जरिए प्रकृति और उसके सौंदर्य का बोध आपको कराएंगे।
इस श्रेणी में सबसे अनुपम गीत 1967 में रिलीज़ फ़िल्म बूंद जो बन गए मोती का है। गीत के बोल हैं 'ये कौन चित्रकार है'। जितेंद्र पर यह गीत फ़िल्माया गया है। भरत व्यास ने इस गीत को लिखा है। मुकेश ने इसमें अपनी मधुर आवाज़ दी है। सतीश भाटिया ने इसे संगीत से सजाया है। गीत में प्रकृति को एक तरह से पेटिंग माना गया है। इसके चित्रकार यानी ईश्वर को प्राकृतिक सौंदर्य के लिए धन्यवाद दिया गया है।
कितनी ख़ूबसूरत ये तस्वीर है, मौसम बेमिसाल बेनज़ीर है
बेमिसाल
1982 में रिलीज़ बेमिसाल का यह लाजवाब गीत कश्मीर की तारीफ़ पर रचा गया है। इसमें कश्मीर की वादियों और उसकी ख़ूबसूरती का दिल से वर्णन किया गया है। अमिताभ बच्चन, विनोद मेहरा और राखी पर फ़िल्माए इस गीत को आनंद बक्षी ने लिखा है। संगीत सदाबहार पंचम दा यानी आरडी बर्मन ने दिया है। लता मंगेशकर, किशोर कुमार और सुरेश वाडकर की कर्णप्रिय आवाज़ ने इस गीत में चार चांद लगा दिए हैं। कश्मीर की ख़ूबसूरती और प्रेम का विषय इस गीत को हमेशा के लिए यादगार बना दिया है।
नीले नीले अंबर पर चांद जब जाए
कलाकार
इस गीत के जरिए नीले आकाश के नीचे स्याह रात में चांद की ख़ूबसूरती का वर्णन बेहतर ढंग से किया गया है। इसके अलावा प्रकृति के अन्य रूपों के सौंदर्य को बयां करने वाला यह गीत एक प्रेमी को मचलने पर मजबूर कर देता है। 1983 में रिलीज़ फ़िल्म कलाकार में कुणाल गोस्वामी पर फ़िल्माए इस गीत को इंदिवर ने लिखा है। बप्पी लाहिरी ने इसे संगीत से सजाया है। किशोर कुमार की आवाज़ में यह गीत लोगों की जुबां पर अक्सर रहता है। गीत के बोल 'ऐसा कोई साथी हो ऐसा कोई प्रेमी हो प्यास दिल की बुझा जाए' प्रेम की कसक को प्रदर्शित करता है।
रिमझिम गिरे सावन, सुलग-सुलग जाए मन
मंजिल
अमिताभ बच्चन और मौसमी चटर्जी पर फ़िल्माए इस गीत में बारिश का सबसे सुहावना स्केच खींचा गया है। लंबे इंतज़ार के बाद जब बारिश होती है तब यह गीत और सुहावना हो जाता है। किशोर कुमार की आवाज़ ने इसे मधुरता प्रदान की है। राहुल देव बर्मन के संगीत में यह गीत मन को दूर तलक लंबा सुकून देता है। 1979 में रिलीज़ फ़िल्म मंजिल के इस गीत को योगेश ने लिखा है।
मेघा रे मेघा रे, मत परदेस जा रे
प्यासा सावन
1981 में रिलीज़ फ़िल्म प्यासा सावन के इस मधुर गीत में सुरेश वाडकर की गायन प्रतिभा सबसे बेहतर ढंग से निखर कर सामने आई है। उनकी सुरमयी आवाज़ का यह गीत सबसे बेहतर प्रमाण है। जितेंद्र और मौसमी चटर्जी पर फ़िल्माए इस गीत में बारिश के मौसमी बादलों का वर्णन किया गया है। लता मंगेशकर ने भी इसमें अपनी आवाज़ दी है। लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ने संगीत दिया है। गीत संतोष आनंद ने लिखा है।
पतझड़ सावन बसंत बहार
सिंदूर
इस गीत में मौसम का ज़िक्र करते हुए प्रेम को और उसके इंतज़ार को पांचवां मौसम क़रार दिया गया है। 1987 में रिलीज़ फ़िल्म सिंदूर के इस गीत को आनंद बक्षी ने लिखा है। लता मंगेशकर और सुरेश वाडकर ने इसमें मधुर आवाज़ दी है। लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ने इसमें संगीत दिया है। गीत कहता है कि एक बरस में चार मौसम होते हैं। इसके बाद पांचवां मौसम प्यार का होता है। जो जीवन में कभी समाप्त नहीं होता।
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