1-
ज़ुल्म ओ सितम बढ़ाएँगे वे तेल की खातिर
हर सर कलम कराएँगे वे तेल की खातिर
चुपके से हाथ काँधे पे रख देंगे एक दिन
मेहमान बनकर आएँगे वे तेल की खातिर
ऊपर से तो दिखाएँगे अहसान ए मुहब्बत
टैरिफ मगर लगाएँगे वे तेल की खातिर
कब्ज़ा करेंगे तेल के कुओं पे बेख़तर
मुल्कों को नोच खाएँगे वे तेल की खातिर
दुनिया बदल ही डालेंगे मैदान-ए-क़ब्र में
शमशान करते जाएँगे वे तेल की खातिर
रहने न देंगे वे किसी भी मुल्क को महफूज़
शोले भी तो जलाएँगे वे तेल की खातिर
हर सू दिखाई दे रहे मंज़र तबाही के,
सब ख़ाक़ में मिलाएँगे वे तेल की खातिर
2-
अब छोड़ भी कुछ देते ज़रा ज़िल्ले इलाही
रुख़ मोड भी तो लेते ज़रा ज़िल्ले इलाही
दुनिया तबाह हो रही तुम्हारी सनक पे
अब अम्न बख्श देते ज़रा ज़िल्ले इलाही
सर काटके क्या पाओगे अब दुश्मनों के तुम
तोबा भी तो कर लेते ज़रा ज़िल्ले इलाही
हद कोई मुकर्रर नहीं तुम्हारी हवस की
अब बस भी तो कर देते ज़रा ज़िल्ले इलाही
हो जाएगी तबाह तेल की ये सल्तनत
एहसास ये कर लेते ज़रा ज़िल्ले इलाही
तब्दील हो रही है क़ब्रगाह में दुनिया
बस फ़ातिहा पढ़ देते ज़रा ज़िल्ले इलाही
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