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ज़ुल्म ओ सितम बढ़ाएँगे वे तेल की खातिर
हर सर कलम कराएँगे वे तेल की खातिर
चुपके से हाथ काँधे पे रख देंगे एक दिन
मेहमान बनकर आएँगे वे तेल की खातिर
ऊपर से तो दिखाएँगे अहसान ए मुहब्बत
टैरिफ मगर लगाएँगे वे तेल की खातिर
कब्ज़ा करेंगे तेल के कुओं पे बेख़तर
मुल्कों को नोच खाएँगे वे तेल की खातिर
दुनिया बदल ही डालेंगे मैदान-ए-क़ब्र में
शमशान करते जाएँगे वे तेल की खातिर
रहने न देंगे वे किसी भी मुल्क को महफूज़
शोले भी तो जलाएँगे वे तेल की खातिर
हर सू दिखाई दे रहे मंज़र तबाही के,
सब ख़ाक़ में मिलाएँगे वे तेल की खातिर
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अब छोड़ भी कुछ देते ज़रा ज़िल्ले इलाही
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