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जब जयशंकर प्रसाद ने कहा- भाइयों के सुख में ही अपने सुख को देखना: अमृतलाल नागर

जब जयशंकर प्रसाद ने कहा- भाइयों के सुख में ही अपने सुख को देखना: अमृतलाल नागर।
                
                                                         
                            प्रसादजी से मेरा केवल बौद्धिक संबंध ही नहीं, हृदय का नाता भी जुड़ा हुआ है। महाकवि के चरणों में बैठकर साहित्य के संस्कार भी पाए हैं और दुनियादारी का व्यावहारिक ज्ञान भी। पिता की मृत्यु के बाद जब बनारस में उनसे मिला था, तब उन्होंने कहा था, "भाइयों के सुख में ही अपने सुख को देखना। हिसाब-किताब साफ रखना। तभी घर के बड़े कहलाओगे।" इसी बात को लेकर प्रसादजी आज भी मेरे जीवन के निकटतम हैं। यों बरसों उनके साथ रहकर अपनापन पाने का सौभाग्य मुझे नहीं प्राप्त हुआ। सब मिलाकर बीस-पच्चीस बार भेंट हुई होगी। आदरणीय भाई विनोदशंकर जी व्यास के कारण ही उनके निकट पहुँच सका। साहित्य की उस गंभीर मूर्ति को खिलखिलाकर हँसते हुए देखा है। चिंतन के गहरे समुद्र को चीरकर निकली हुई सरल हँसी उनके सहज सामर्थ्य की थाह बतलाई थी। यही उनका परिचय है जो मैंने पाया है। प्रसाद आशावादी थे और उनकी आशावादिता का अडिग आधार-स्तंभ थी उनकी आस्तिकता।
                                                                 
                            

मेरा मन जड़ होकर भी अभी चेतना से दूर नहीं गया। पिछली ज्ञान-कमाई के संस्कार नए जीवन के लिए आज भी बल देते हैं। चारों ओर फैली हुई निराशा और मेरे मन के अवसाद को पीछे ढकेलकर महाकवि का स्वर मेरी क्रियाशीलता को हौसला दिलाता है :

  कर्म-यज्ञ से जीवन के
सपनों का स्वर्ग मिलेगा।
इसी विपिन में मानस की
आशा का कुसुम खिलेगा। आगे पढ़ें

6 वर्ष पहले

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