कवि केदारनाथ सिंह का जाना इलाहाबाद और वाराणसी ही नहीं, समग्र हिंदी साहित्य के लिए भी बहुत दुखद है। वह हिंदी के ऐसे कवि थे, जिन्होंने हिंदी कविता को समृद्ध करने के साथ ही एक परंपरा और कई पीढ़ियों को कविता का संस्कार दिया।
वह लोक के जीवन को आधुनिकता के अनुभवों के साथ पिरोकर ऐसा संसार रचते थे कि कविता चमक उठती थी। उनके लोक की जड़ें यूपी और बिहार में थीं, लेकिन इस लोक का विस्तार वैश्विक था। रघुवीर सहाय उन्हें विश्व कविता का बड़ा हस्ताक्षर मानते थे।
उन्होंने कविता की एक पूरी पीढ़ी को प्रभावित किया। इसमें राजेश जोशी, अरुण कमल सरीखे अनेक महत्वपूर्ण नाम शामिल हैं। नब्बे के दशक में हमारी पीढ़ी के कवियों पर भी उनका गहरा प्रभाव रहा। और तो और नए से नए रचनाकारों को भी वह अद्भुत स्नेह करते थे।
लोक से उनका जुड़ाव ऐसा था कि वह जब भी अवसर मिलता, खासकर छुट्टियों में अपने गांव जरूर जाते थे और दिल्ली को छोड़ वहां के लोगों के साथ वैसे ही घुलमिल जाते थे।
उन्होंने बनारस पर बेहतरीन कविताएं लिखीं, लेकिन इलाहाबाद के प्रति भी उनका गहरा लगाव था। महादेवी वर्मा से लेकर भैरव प्रसाद गुप्त, विजयदेव नारायण साही, रामस्वरूप चतुर्वेदी, डॉ.जगदीश गुप्त, मार्कण्डेय, दूधनाथ सिंह, शेखर जोशी आदि के साथ उनका सीधा संवाद था।
वह जब भी इलाहाबाद आते, प्राय: मार्कण्डेय जी के घर ही रुकते। लोकभारती में रमेश ग्रोवर व दिनेश ग्रोवर और कॉफी हाउस में प्रोफेसर सत्यप्रकाश मिश्र के साथ उनकी बैठकें होती थीं।
सभी भारतीय भाषाओं के समकालीन कवियों से थे अच्छे रिश्ते
उनकी कविताएं जितनी लाजवाब थीं, उनका कविता पाठ का अंदाज उससे भी ज्यादा लाजवाब था। वह अज्ञेय के बहुत प्रिय थे। बांग्ला, उड़िया, मलयालम सहित तकरीबन सभी भारतीय भाषाओं के समकालीन कवियों के साथ उनके अच्छे रिश्ते थे।
उन्हें मलयालम का बड़ा सम्मान मिला था तो उड़िया संसार में भी उनका मान था। ‘कबिरा ऐसे जाइये आप हंसे जग रोय’ की तर्ज पर केदारजी तो हंसते हुए चले गए लेकिन उनके जाने से हिंदी समाज की जो अपूरणीय क्षति हुई है, उसे पूरा नहीं किया जा सकता है। केदार जी हमेशा याद आएंगे।
(लेखक वरिष्ठ कवि एवं निदेशक जीबी पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान)
आगे पढ़ें
इलाहाबाद से था गहरा लगाव
8 वर्ष पहले
कमेंट
कमेंट X