94 साल की उम्र में कृष्णा सोबती का चले जाना एक युग के खत्म होने जैसा है। बहुत कम लोग जानते हैं कि कृष्णा सोबती ने कुछ कविताएं भी लिखी हैं। कुछ ऐसी कविताएं जिनसे उनके सत्ता और सरकारों के प्रति नाराज़गी भी झलकती है और उनके भीतर छिपी बेचैनी भी दिखती है। उनके उपन्यास, उनकी कहानियां और संस्मरण खूब चर्चा में रहे हैं। एक लंबी फेहरिस्त है उनकी किताबों की – मित्रो मरजानी, डार से बिछुड़ी, ज़िंदगीनामा, ऐ लड़की, यारों के यार तिनपहाड़, दिलो दानिश, ज़िंदारुख और भी ढेर सारी। उनकी रचनाओं में बंटवारे का जो दर्द आपको महसूस होता है और जीवन की जो सच्चाइयां मिलती हैं, उससे कहीं ज्यादा उनके भीतर अपने सत्ता प्रतिष्ठानों और सियासत के घिनौने खेल को लेकर नाराज़गी झलकती है।
आपको याद होगा 2010 में कृष्णा सोबती को सरकार ने पद्म विभूषण सम्मान देने का ऐलान किया, लेकिन कृष्णा जी ने बड़े अदब के साथ वह सम्मान लेने से मना कर दिया। एक इंटरव्यू में जब उनसे इस बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा – ‘मैं बहुत साधारण और छोटी लेखिका हूं। और मेरा मानना है कि जो बुद्धिजीवी हैं, जो सोचने की ताकत रखते हैं, अगर वो अपने मुल्क की जनता और यहां की हकीकत को देख सकते हैं, उसे ठीक से पढ़ सकते हैं, उसे बढ़ा चढ़ा कर पेश नहीं करते... तो उनका ये फर्ज है कि वो इस्टैबलिशमेंट से दूर रहें...’
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लेकिन टुकड़े टुकड़े में उन्हें...
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