यह साल कैफ़ी आज़मी का जन्म शताब्दी वर्ष है। पूरे साल विभिन्न स्थानों पर इस अज़ीम शायर की याद में कार्यक्रम आयोजित किेए जा रहे हैं। न सिर्फ़ भारत बल्कि इंग्लैंड समेत दुनियाभर में यह कार्यक्रम हो रहे हैं। कैफ़ी की शख़्सियत उन ख़ास लोगों में शामिल होती है जिन्होंने जो महसूस किया वही जीया और वही लिखा भी। उन्होंने औरतों को साथ चलने की बात की, मज़दूरों के हक़ों की आवाज़ उठाई और किसानों पर नज़्में कहीं।
वे कम्यूनिस्ट पार्टी के सदस्य थे और उन्हीं के मुंबई स्थित रेड फ़्लैग हॉल में रहते थे। जहां उनके साथ 8 परिवार रहा करते थे। जिनके परिवार में पति व पत्नी पार्टी से जुड़े होते उनसे किराया नहीं लिया जाता था लेकिन बाकियों से लिया जाता था। पार्टी अपने मेम्बर को खर्चे के लिए 40 रुपए महीने देती थी। कैफ़ी पार्टी के लिए काम करते थे लेकिन उनकी बेगम शौक़त कैफ़ी से किराया लिया जाता था, क्योंकि वह पार्टी से नहीं जुड़ी थीं। जब कैफ़ी और शौक़त इस रेड फ़्लैग हॉल में शिफ़्ट हुए थे तब शाबाना क़रीब एक साल की थीं।
कैफ़ी आज़मगढ़ के एक गांव मिजवां में पैदा हुए थे। उनके वालिद ज़मींदार थे, लेकिन कैफ़ी का मिज़ाज अलग था। शबाना बताती हैं कि बकौल अम्मा कैफ़ी बहुत संवेदनशील थे। जब वे सात साल के थे, तब ईद पर नए कपड़े इसलिए नहीं पहनते थे क्योंकि किसानों के बच्चों को नए कपड़े नहीं मिलते थे।
कैफ़ी और कम्यूनिस्ट पार्टी
कानपुर में कैफ़ी जूते बनाने वालों के साथ काम करने लगे और शायरी करने लगे। वे अपनी शायरी कम्यूनिस्ट पार्टी को भेजते थे। इसी सिलसिले में बम्बई में सज्जाद जहीर और पीसी जोशी ने उनकी शायरी देखी तो बड़े प्रभावित हुए और बम्बई बुला लिया। यहां आकर कैफ़ी साहब ने औपचारिक तौर पर कम्यूनिस्ट पार्टी जॉइन कर ली।
1945 में बम्बई के ग्रांट रोड पर जिस मारवाड़ी हाई स्कूल में पीडब्ल्यूए का अगला अधिवेशन हुआ तो कैफ़ी आज़मी भी उसमें शामिल थे। यही वो समय था जब कैफ़ी ने 'औरत' जैसी नज़्म लिखी। एक ऐसी नज़्म जो 75 साल की हो गई और जिसे आज भी स्त्रियों के लिए, स्त्रीवाद के लिए मैनिफेस्टो कहा जा सकता है। वह इसलिए भी कि उस ज़माने में स्त्रीवाद को लेकर इस तरह की कोई बहस न थी, जब कैफ़ी कह रहे थे कि 'कैद बन जाए मुहब्बत तो मुहब्बत से निकल'।
अगर हम उस पूरे वक़्त को देखें तो वहां मज़दूरों की बात हो रही होती है। साम्प्रदायिकता की बात हो रही होती है। एक बराबरी के समाज की बात तो हो रही होती है लेकिन इसमें पुरुष ही अधिक दिखता हा अक्सर। ऐसे में कैफ़ी होने का मतलब क्या होता है, यह समझा जा सकता है।
- फ़िरोज ख़ान
उठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझे
क़ल्ब-ए-माहौल में लर्ज़ां शरर-ए-जंग हैं आज
हौसले वक़्त के और ज़ीस्त के यक-रंग हैं आज
आबगीनों में तपाँ वलवला-ए-संग हैं आज
हुस्न और इश्क़ हम-आवाज़ ओ हम-आहंग हैं आज
जिस में जलता हूँ उसी आग में जलना है तुझे
उठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझे
तेरे क़दमों में है फ़िरदौस-ए-तमद्दुन की बहार
तेरी नज़रों पे है तहज़ीब ओ तरक़्क़ी का मदार
तेरी आग़ोश है गहवारा-ए-नफ़्स-ओ-किरदार
ता-ब-कै गिर्द तिरे वहम ओ तअ'य्युन का हिसार
कौंद कर मज्लिस-ए-ख़ल्वत से निकलना है तुझे
उठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझे
तू कि बे-जान खिलौनों से बहल जाती है
तपती साँसों की हरारत से पिघल जाती है
पाँव जिस राह में रखती है फिसल जाती है
बन के सीमाब हर इक ज़र्फ़ में ढल जाती है
ज़ीस्त के आहनी साँचे में भी ढलना है तुझे
उठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझे
ज़िंदगी जेहद में है सब्र के क़ाबू में नहीं
नब्ज़-ए-हस्ती का लहू काँपते आँसू में नहीं
उड़ने खुलने में है निकहत ख़म-ए-गेसू में नहीं
जन्नत इक और है जो मर्द के पहलू में नहीं
उस की आज़ाद रविश पर भी मचलना है तुझे
उठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझे
गोशे गोशे में सुलगती है चिता तेरे लिए
फ़र्ज़ का भेस बदलती है क़ज़ा तेरे लिए
क़हर है तेरी हर इक नर्म अदा तेरे लिए
ज़हर ही ज़हर है दुनिया की हवा तेरे लिए
रुत बदल डाल अगर फूलना फलना है तुझे
उठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझे
क़द्र अब तक तिरी तारीख़ ने जानी ही नहीं
तुझ में शो'ले भी हैं बस अश्क-फ़िशानी ही नहीं
तू हक़ीक़त भी है दिलचस्प कहानी ही नहीं
तेरी हस्ती भी है इक चीज़ जवानी ही नहीं
अपनी तारीख़ का उन्वान बदलना है तुझे
उठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझे
तोड़ कर रस्म का बुत बंद-ए-क़दामत से निकल
ज़ोफ़-ए-इशरत से निकल वहम-ए-नज़ाकत से निकल
नफ़्स के खींचे हुए हल्क़ा-ए-अज़्मत से निकल
क़ैद बन जाए मोहब्बत तो मोहब्बत से निकल
राह का ख़ार ही क्या गुल भी कुचलना है तुझे
उठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझे
तोड़ ये अज़्म-शिकन दग़दग़ा-ए-पंद भी तोड़
तेरी ख़ातिर है जो ज़ंजीर वो सौगंद भी तोड़
तौक़ ये भी है ज़मुर्रद का गुलू-बंद भी तोड़
तोड़ पैमाना-ए-मर्दान-ए-ख़िरद-मंद भी तोड़
बन के तूफ़ान छलकना है उबलना है तुझे
उठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझे
तू फ़लातून ओ अरस्तू है तू ज़हरा परवीं
तेरे क़ब्ज़े में है गर्दूं तिरी ठोकर में ज़मीं
हाँ उठा जल्द उठा पा-ए-मुक़द्दर से जबीं
मैं भी रुकने का नहीं वक़्त भी रुकने का नहीं
लड़खड़ाएगी कहाँ तक कि सँभलना है तुझे
उठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझे
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4 वर्ष पहले
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