‘ऐ दिले नादां, ऐ दिले नादां...
आरज़ू क्या है, जुस्तजू क्या है’
लता मंगेशकर की आवाज़ में रज़िया सुल्तान फ़िल्म का यह गाना आपको याद है? इसी गाने से आपको जांनिसार अख़्तर की शायरी का फ़ैलाव समझ आ जाता है। पचास से साठ के दशक की कई फ़िल्में जैसे सीआईडी का गाना ‘आंखों ही आंखों में इशारा हो गया’ या फिर ‘प्रेम परबत’ का वह गीत ‘ये दिल और उनकी निगाहों के साये’, मशहूर फ़िल्म ‘नूरी’ का गीत ‘आजा रे ओ मेरे दिलबर आजा’ के लिए उन्हें फ़िल्म फेयर अवार्ड भी मिला लेकिन फ़िल्मों के गीत से ज़्यादा जांनिसार अख़्तर की शायरी मशहूर हुई -
अशआर मेरे यूं तो ज़माने के लिए हैं
कुछ शेर फ़कत उनको सुनाने के लिए हैं
या फिर
जब ज़ख्म लगे तो क़ातिल को दुआ दी जाए
है यही रस्म तो ये रस्म उठा दी जाए
हम से पूछो कि ग़ज़ल क्या है ग़ज़ल का फन क्या
चंद लफ़्ज़ों में कोई आग छुपा दी जाए
बकौल निदा फ़ाज़ली, ‘जांनिसार अख़्तर ने शायरी को पारंपरिक रूमानी दायरे से बाहर निकालकर यथार्थ की ख़ुरदरी धरती पर लाकर खड़ा कर दिया।’
बीसवीं सदी के शायरों में जांनिसार अख़्तर की शायरी का मयार काफी बड़ा है। जांनिसार अख़्तर के दादा मौलाना फ़ज़ले हक़ खैराबदी थे। ये वही फ़ज़ले हक़ खैराबदी हैं जिन्होंने ग़ालिब का दीवान, खुद ग़ालिब के कहने पर संकलित किया था। यह जांनिसार अख़्तर की प्रसिद्धी ही थी कि जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें पिछले 300 सालों की हिन्दुस्तानी शायरी को एक जगह पर इकट्ठा करने का जिम्मा सौंपा था।
लेकिन जांनिसार अख़्तर जितने बेहतरीन शायर थे उतने ही बेपरवाह बाप और बेवफ़ा शौहर। जांनिसार अख़्तर का निकाह 1943 में मशहूर शायर मजाज़ की बहन साफ़िया अख़्तर से हुआ। बेहद नफ़ीस, पढ़ी लिखी-औरत साफ़िया ने जांनिसार के लिए काफ़ी दुःख उठाये पर कभी कहा नहीं। जांनिसार भोपाल की अच्छी ख़ासी नौकरी छोड़कर मुंबई चले आये थे। साफ़िया अपने दोनों बच्चों जावेद अख़्तर और सलमान अख़्तर को भी संभालतीं और नौकरी भी करतीं। वे जांनिसार का मुंबई का ख़र्च भी तब तक उठातीं रही जब तक की कैंसर से उनकी मृत्यु न हो गई -
ज़रा सी बात पे हर रस्म तोड़ आया था
दिल-ए-तबाह ने भी क्या मिज़ाज पाया था
मुआफ़ कर न सकी मेरी ज़िन्दगी मुझको
वो एक लम्हा कि मैं तुझसे तंग आया था
पता नहीं कि मेरे बाद उन पे क्या गुज़री
मैं चन्द ख़्वाब ज़माने में छोड़ आया था
जांनिसार आख़िरी दम तक जवान रहे
अपनी किताब ‘तरकश’ में जावेद अख्तर ने कुछ यूं लिखा है, "18 अगस्त 1976 को मेरे बाप (जांनिसार अख़्तर) की मृत्यु होती है (मरने से नौ दिन पहले उन्होंने मुझे अपनी आख़िरी किताब ऑटोग्राफ करके दी थी, उस पर लिखा था- ‘जब हम न रहेंगे तो बहुत याद करोगे।’ उन्होंने ठीक लिखा था। अब तक तो मैं अपने आप को एक बाग़ी और नारा बेटे के रूप में पहचानता था मगर अब मैं कौन हूं...।"
जावेद की जांनिसार से बग़ावत इसलिए थी कि जांनिसार ने उनकी मां, उनका और सलमान अख़्तर का ख़्याल नहीं रखा। साफ़िया बेवक़्त ही इस दुनिया से रुख़सत हो गयी थीं, जावेद और सलमान कभी अपनी खाला, कभी नानी के घर पर अजनबियों की तरह ही रहे। पत्नी साफ़िया अख़्तर की मौत पर लिखी हुई नज़्म ‘ख़ाके दिल’ आज कल्ट का दर्ज़ा रखती है। उनकी एक और नज़्म ‘आख़िरी मुलाक़ात’ में जब वे कहते हैं -
मत रोको इन्हें मेरे पास आने दो
ये मुझ से मिलने आये हैं
मैं ख़ुद न जिन्हें पहचान सकूं
कुछ इतने धुंधले साए हैं
जांनिसार अख़्तर ने एक फ़िल्म बनायीं थी जिसका नाम था ‘बहू बेग़म’। इस फ़िल्म के गाने उन्होंने साहिर लुधियानवी से लिखवाए थे। फ़िल्म नहीं चली पर गाने हिट हुए। नतीजा अख़्तर साहब आर्थिक बदहाली के शिकार हो कर इंडस्ट्री से आउट हो गए। अब वे पूरी तरह से साहिर तक सिमट के रह गए। साहिर लुधियानवी और जांनिसार के बीच प्रगतिशील लेखक संघ वाली दोस्ती थी जो शायद बाद में तिजारती मजबूरी बन गई। साहिर साहब को महफ़िलें जमाने और उनमें ‘वाह साहिर वाह’ सुनने का शौक था। ऐसा कहा जाता है कि साहिर लुधियानवी जांनिसार को अपना दरबारी बना रहने के लिए हर महीने एक तय शुदा रकम देते थे और इसके बदले जांनिसार हमेशा ‘हां साहिर’ कहते थे।
जांनिसार ‘बहू बेग़म’ के बाद एक तरह से बेरोज़गार हो गए थे। इस दौरान साहिर ने उनका हाथ थामा, दोस्ती के नाते नहीं, शायद किसी और नाते। निदा फ़ाज़ली बताते हैं कि जांनिसार अख़्तर ज़रूरत से ज़्यादा जल्दी शेर लिखने वाले शायर भी थे। साहिर को एक पंक्ति सोचने में जितना समय लगता था, जांनिसार उतने समय में 25 पंक्तियां जोड़ लेते थे। बकौल निदा फाज़ली ‘एक तरफ़ ज़रूरत थी, दूसरी ओर दौलत।’ जानकार बताते हैं कि वे कलाम जिनमें साहिर की बू नहीं आती, वे जांनिसार अख़्तर ने लिखे हैं -
ज़माना आज नहीं डगमगा के चलने का
संभल भी जा कि अभी वक़्त है संभलने का
बहार आये चली जाये फिर चली आये
मगर ये दर्द का मौसम नहीं बदलने का
ये ठीक है कि सितारों पे घूम आये हैं
मगर किसे है सलीक़ा ज़मीं पे चलने का
निदा फ़ाज़ली लिखते हैं, "जांनिसार आख़िरी दम तक जवान रहे। बुढ़ापे में जवानी का यह जोश उर्दू इतिहास में एक चमत्कार है जो उनकी याद को शेरो-अदब की महफ़िल में हमेशा जवान रखेगा -
सुबह की आस किसी लम्हे जो घट जाती है
ज़िन्दगी सहम के ख़्वाबों से लिपट जाती है
शाम ढलते ही तेरा दर्द चमक उठता है
तीरगी दूर तलक रात की छट जाती है
(लेखक महात्माध गांधी अंतराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय में हिंदी अधिकारी व प्रकाशन प्रभारी हैं)
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जांनिसार आख़िरी दम तक जवान रहे
8 वर्ष पहले
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