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basant ka agradoot - agyeya with shivmangal singh suman meets nirala

मुड़ मुड़ के देखता हूं

जब अज्ञेय ने शिवमंगल सिंह से कहा "नाम 'सुमन' रख लेने से क्या होता है अगर सवेरे खिल भी न सकें"

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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एक बार अज्ञेय अपने लेखन के शुरूआती दिनों में शिवमंगल सिंह सुमन जी के साथ सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' जी से मिलने के लिये गये। उस समय दोपहर हो रही थी और निराला जी अपने खाने के लिये कुछ बना रहे थे। तो जैसे ही उन्होंने द्वार पर दस्तक दी, निराला जी उन्हें पहचान नहीं पाये और उनका नाम पता पूछने लगे, उन्होंने जब अज्ञेय का नाम सुना तो अंदर आने की आज्ञा दे दी। अज्ञेय को उस समय बड़े लेखक भी जानने लगे थे। अंदर आने पर निराला रसोई में गये। और वो दोनों बस इधर-उधर कमरे की नीरसता को ताकते रहे।

इस बीच निराला एक बड़ी बाटी में कुछ ले आए और उन दोनों के बीच बाटी रखते हुए बोले, ''लो, खाओ, मैं पानी लेकर आता हूँ,'' और फिर भीतर लौट गए।
बाटी में कटहल की भुजिया थी। बाटी में ही सफाई से उसके दो हिस्से कर दिए गए थे। निराला के लौटने तक दोनों रुके रहे। यह क्लेश दोनों के मन में था कि निरालाजी अपने लिए जो भोजन बना रहे थे वह सारा-का-सारा उन्होंने हमारे सामने परोस दिया और अब दिन-भर भूखे रहेंगे। लेकिन अज्ञेय यह भी जानते थे कि हमारा कुछ भी कहना व्यर्थ होगा- निराला का आतिथ्य ऐसा ही जालिम आतिथ्य है।

सुमन ने कहा, ''निरालाजी, आप...''
''हम क्या?''
''निरालाजी, आप नहीं खाएँगे तो हम भी नहीं खाएँगे।''
निरालाजी ने एक हाथ सुमन की गर्दन की ओर बढ़ाते हुए कहा, ''खाओगे कैसे नहीं? हम गुद्दी पकड़कर खिलाएँगे।''
सुमन ने फिर हठ करते हुए कहा, ''लेकिन, निरालाजी, यह तो आपका भोजन था। अब आप क्या उपवास करेंगे ?''
निराला ने स्थिर दृष्टि से सुमन की ओर देखते हुए कहा, ''तो भले आदमी, किसी से मिलने जाओ तो समय-असमय का विचार भी तो करना होता है।'' और फिर थोड़ा घुड़ककर बोले : ''अब आए हो तो भुगतो।''
दोनों ने कटहल की वह भुजिया किसी तरह गले से नीचे उतारी। बहुत स्वादिष्ट बनी थी, लेकिन उस समय स्वाद का विचार करने की हालत उनकी नहीं थी। जब वे लोग बाहर निकले तो सुमन ने खिन्न स्वर में कहा, ''भाई, यह तो बड़ा अन्याय हो गया।''
अज्ञेय ने कहा, ''इसीलिए मैं कल से कह रहा था कि सवेरे जल्दी चलना है, लेकिन आपको तो सिंगार-पट्टी से और कोल्ड-क्रीम से फ़ुरसत मिले तब तो! नाम 'सुमन' रख लेने से क्या होता है अगर सवेरे-सवेरे सहज खिल भी न सकें!''



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