कवि झल्लाया हुआ है। वह जितनी बार संध्या के रसरंजन को डिनर एेंड कॉकटेल में अनुवाद करने की सोचता है, क्रोध से भर उठता है। उसका मानना है कि वह क्रांति कहता है, लोग दंगा समझ लेते हैं। वह करुणा का रेट कार्ड बनाता है, लोग किसी एनजीओ के फ्रॉड का ताजा आंकड़ा समझ लेते हैं। वह सन अड़तालीस कहता है, लोग सन चौरासी समझ लेते हैं। वह राफेल कहता है, लोग बोफोर्स समझ लेते हैं। वह लालबत्ती जलाता है, लोग उसे हरी बत्ती समझ लेते हैं। वह गोभी के फूल उठाता है, लोग बम समझ लेते हैं। वह ऊंच कहता है, सुनने वाले नीच समझ लेते हैं। वह इनका करे तो क्या करे?
कवि को डर है कि कल को वह कविता कहेगा और लोग उसे कनकौआ समझ लेंगे। वह नागपुर कहेगा और लोग दिल्ली समझ लेंगे। वह राम कहेगा, लोग आराम समझ लेंगे। वह विचार कहेगा और लोग भूख समझ लेंगे।
बड़ा विचित्र समय आ गया है। वाक्य उत्तर में उदय होता है पर अर्थ दक्षिण से अस्त होता है। कवि इस निर्मम समय में गहरे डर देख रहा है।
कवि के डर कई हैं। पर जब वह डर के बारे में कहने से पहले ही क्रोध से भर जाता है। उसे डर है कि, ‘डर’ कहा तो लोग उसे ‘हिम्मत’ समझ लेंगे। वह कई बार सोचता है ‘हिम्मत’ ही कह दे तो लोग शायद ‘डर’ समझ लें। लेकिन उसे डर है कि चूंकि समझने का कोई सिद्ध पैटर्न ही नहीं है इसलिए हो सकता है कि ‘हिम्मत’ को कोई ‘कीमत’ ही समझ ले।
बड़ा विकट समय है। कवि ने ऐसा क्रूर समय कभी नहीं देखा। वह अलंकार बोलता है, तो लोग गाली समझ बैठते हैं। एक बार उसने दूध-घी की नदियों का पाट नाप कर एक डेयरी की बैलेंस शीट बनाई और लोगों से उसके प्रॉफिट का हिसाब मांगा। लोगों ने उसे अतीत की समृद्धि का मुहावरा समझ लिया और व्याकरण कोश में डाल दिया। कवि की शिकायत है कि वह कब से सोने की चिड़िया का फोटो बतौर सबूत मांग रहा है और लोग हैं कि उसे भाषा की प्रतीकात्मकता का मजा समझ रहे हैं।
कवि को इस मुल्क पे दया आती है। कभी-कभी इसी दया के वशीभूत वह पुराने फोटो, पुरानी डायरी, पुरानी पत्रिकाओं के पन्ने, पुराना शहद या पुराने चावल पेश करता है, ताकि मुल्क सही अर्थ पकड़ सके। मगर दुर्भाग्य, मुल्क न जाने किस भाषा के नाले में गिरकर आलू को सोना बनाना सीख लेता है, मगर कवि की भाषा में उतरना नहीं सीख पाता।
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