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कवि की अट्टमट्टू खराब है...

kavi
                
                                                         
                            
कवि झल्लाया हुआ है। वह जितनी बार संध्या के रसरंजन को डिनर एेंड कॉकटेल में अनुवाद करने की सोचता है, क्रोध से भर उठता है। उसका मानना है कि वह क्रांति कहता है, लोग दंगा समझ लेते हैं। वह करुणा का रेट कार्ड बनाता है, लोग किसी एनजीओ के फ्रॉड का ताजा आंकड़ा समझ लेते हैं। वह सन अड़तालीस कहता है, लोग सन चौरासी समझ लेते हैं। वह राफेल कहता है, लोग बोफोर्स समझ लेते हैं। वह लालबत्ती जलाता है, लोग उसे हरी बत्ती समझ लेते हैं। वह गोभी के फूल उठाता है, लोग बम समझ लेते हैं। वह ऊंच कहता है, सुनने वाले नीच समझ लेते हैं। वह इनका करे तो क्या करे?

कवि को डर है कि कल को वह कविता कहेगा और लोग उसे कनकौआ समझ लेंगे। वह नागपुर कहेगा और लोग दिल्ली समझ लेंगे। वह राम कहेगा, लोग आराम समझ लेंगे। वह विचार कहेगा और लोग भूख समझ लेंगे। 

बड़ा विचित्र समय आ गया है। वाक्य उत्तर में उदय होता है पर अर्थ दक्षिण से अस्त होता है। कवि इस निर्मम समय में गहरे डर देख रहा है।
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7 वर्ष पहले

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