खादी रंग की शर्ट पर आशिक़नुमा नीले रंग का स्कार्फ़ पहने एक युवक अपनी प्रेमिका के साथ कभी गाड़ी में घूमता है तो कभी समंदर किनारे बैठ जाता है। आंखों में प्रीत है, ज़ुबां पर गीत और हाथ में उस गाड़ी का स्टीयरिंग है जो उन्हें अतीत और भविष्य के तमाम जंजाल से निकालकर वर्तमान का भ्रमण करवा रही है। गाड़ी की कमान संभाले वह पीछे की सीट पर बैठी अपनी महबूबा को मोहब्बत के अलंकार में सजा रहा है।
आंखों की प्रीत की तो व्याख्या नहीं हो सकती कि जिस प्रेम को शब्दों की परिधि में बांधा जा सके वह जीवन को उन्मुक्त कैसे करेगा। लेकिन जो गीत वह गा रहा है उस पर चर्चा की जा सकती है, गीत में मन के एहसास बयां होते हैं। इससे ख़ूबसूरत सीरत की बयानगी और क्या होगी।
यहां जिस माशूक की दिल्लगी की कैफ़ियत बयां की गयी है वह फ़िल्म ‘हंसते ज़ख़्म’ का है। जो गीत वह गा रहा है उसमें दिल का ब्यौरा अपनी प्रेमिका को दे रहा है, गीत है ‘तुम जो मिल गए हो तो ये लगता है ये जहां मिल गया है।’
1973 में आयी इस फ़िल्म के गीत को लिखने वाले हैं मशहूर शायर कैफ़ी आज़मी, संगीत मदनमोहन का है और गायन से कर्णप्रिय रस घोलने वाले हैं मोहम्मद रफ़ी और लता मंगेशकर।
आसमान में बारिश की अलामत हो, सफ़र तवील हो और प्रेमिका का साथ हो। तो क्यूं न किसी महबूब को लगेगा कि उसे सारा जहां मिल गया इसी वक़्त, इसी सफ़र में। कि जहां के सारे रास्ते प्रेम तक ही तो जाते हैं, प्रेम ही मंज़िल है और प्रेम ही सफ़र अब चाहें भटक पहुंचे या किसी नक्शे के सहारे। सो इस गीत का किरदार भी कम-अज़-कम इस गाने में अपनी क़िस्मत तक पहुंच गया है।
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