इश्क में संकल्प को परिभाषित करती फिल्म 'एक दूजे के लिए' ने देश के कई शहरों में सिल्वर ज्युबली मनाई थी। प्रेम के भावपूर्ण गीतों और दिलकश संगीत की वहज से यह फिल्म युवाओं में चर्चित हुई थी। 1981 में रिलीज हुई के बालचंदर की यह फिल्म दो अलग-अलग जाति के युवाओं की प्रेम कहानी है। जिसमें गीत-संगीत के साथ इश्क की तरंगें हर पल लहराती हैं। इस फिल्म में एक से बेहतर एक गीत हैं। जिनमें से 'तेरे मेरे बीच में कैसा है ये बंधन अंजाना' गीत एक प्रकार से मुहब्बत की फुलवारी है।
ओ, तेरे मेरे बीच में
कैसा है यह बन्धन अंजाना
मैंने नहीं जाना, तूने नहीं जाना
तेरे मेरे बीच में...
इस फिल्म में नायिका रति अग्निहोत्री ने संकल्प से इश्क को पाने की जो भरपूर कोशिश की है वह अन्यत्र फिल्मों में कम हीं दिखती है। नायक कमल हासन से ज्यादा नायिका रति अग्निहोत्री ने इस फिल्म को मोहब्बत और उसके संकल्प का मनोहारी कलेवर दिया है। इस फिल्म का गीत...तेरे मेरे बीच में कैसा है बंधन...मुझे काफी बेहतर लगता है। आनंद बक्षी के इस गीत को लक्ष्मीकांत प्यारेलाल का सुमधुर संगीत और कर्णप्रिय बनाता है। लता मंगेशकर की आवाज में यह गीत प्रेमियों को आज भी साहस दे रहा है। गीत के बोल अद्भुत हैं। दो प्रेमी 'बंधन' को नहीं जानते लेकिन बिना जाने बंध जाते हैं। यहीं तो प्रेम की सबसे हसीं शुरुआत कही जा सकती है। इस बंधन को जानने की कोशिश दो प्रेमी करते हैं और इसी प्रयास में वह एक दूसरे से गहरे बंधते जाते हैं। प्रेम के पायदान पर सफर शुरू करने लगते हैं। गीत समुद्र की लहरों और चट्टानों की टकराहट और पानी कलकल और कलरव के बीच फिल्माया गया है। गीत के आसपास मोहबबत की पूरी कायनात बरसती है।
एक डोर खींचे दूजा दौड़ा चला आए
कच्चे धागे में बंधा चला आए
ऐसे जैसे कोई...
ऐसे जैसे कोई, दीवाना
मैंने नहीं जाना, तूने नहीं जाना
तेरे मेरे बीच में...
गीत में रति अग्निहोत्री की अदा तो हर प्यार करने वाले को मोहब्बत का कायल कर देगी। किस तरह वह नायक कमल हासन को 'एकटक' देखते हुए इस गीत की शुरुआत करती है वह आप पर्दे पर ही देखेंगे तभी महसूस कर सकेंगे। नायिका की यही 'एकटक' नजर ही उसके संकल्प को दर्शाती है। गीत का सार है कि चाहे जो कुछ हो जाओ सच्चे प्रेमियों को अपनी भावनाओं और धड़कन के लिए एक आधार/बुनियाद तो चुनना ही होगा। इसी 'आधार' को चुनने के बाद ही आदमी के 'इश्क' का निष्कर्ष निकलेगा। क्योंकि वैसे भी हर किसी के एक 'निष्कर्ष' तय है। और सब उसकी की तलाश में है।
इतनी ज़ुबानें बोलें लोग हमजोली
दुनिया में प्यार की एक है बोली
बोले जो शमा ...
बोले जो शमा, परवाना
मैंने नहीं जाना, तूने नहीं जाना
गीत के बोल...एक डोर खीचें दूजा चला आए...कच्चे धागे में बंधा चला आए...बता रहा है प्रेम की डोर बहुत महीन होती है पर इसके बंधन काफी गहरे होते हैं। इस डोर की जकड़न लोहे की हथकड़ी से भी ज्यादा मजबूत होती है। यह डोर को मजबूत बनाए रखने के लिए दोनों प्रेमियों को काफी जहमत करनी पड़ती है। अपने प्रेम को दुनिया की नजरों से बचा कर रखना पड़ता है। प्रेम को सफल करने के लिए संकल्प के साथ समर्पण भी जरूरी होता है। अगर संकल्प और समर्पण सही ढंग से मिल गए तो 'इश्क' निश्चित तौर पर परवान चढ़ेगा और दिलवाले 'दुल्हनिया' ले जाएंगे...
कैसा है यह बन्धन अंजाना
मैंने नहीं जाना, तूने नहीं जाना
तेरे मेरे बीच में ...
तेरे मेरे बीच में कैसा है ये बन्धन अन्जाना
मैं ने नहीं जाना, तू ने नहीं जाना
रति अग्निहोत्री गीत में जब कहती है कि पहनूंगी मैं तेरे हाथों से कंगना...यह साहस है पर वास्तव में वह यह वादा खुद से कर रही है। और इश्क में जब वादा दूसरे की बजाय खुद से किया जाता है तो उसके सफल होने की संभावना बढ़ जाती है। इसी गीत में यह भी बताया गया है कि एक लड़की का प्रेम के प्रति कितनी टूट सकती है। एक लड़की का ऐसा टूटना शायद दुनिया का सबसे हसीं एहसास है। मेरी नजर में मां की ममता के अलावा किसी लड़की का 'इजहार' इस दुनिया में सबसे सुंदर होता है। गीत यह भी बताता है कि कोई लड़की पहले किसी के करीब नहीं आती है। हसरत जयपुरी साहब लिख चुके हैं कि 'कोई महबूबा कदम पहले उठाती नहीं...मजबूर दिल से ना हो तो 'पास' आती नहीं...। रति अग्निहोत्री की इश्क से भरी मतवाली अदा इस फिल्म का सार है।
पहनूँगी मैं तेरे हाथों से कंगना
जाएगी मेरी डोली तेरे ही अंगना
चाहे कुछ कर ले ...
चाहे कुछ कर ले, ज़माना
मैंने नहीं जाना, तूने नहीं जाना
तेरे मेरे बीच में ...
मोहब्बत एक संकल्प है...एक वादा है...आज के दौर में भी यह जिंदा रहे इसके लिए यह वादा खुद से किया जाए...यह संकल्प खुद से लिया जाए...संकल्प के साथ समर्पण जाति, धर्म, अमीरी, गरीबी सभी दीवारों को भेद देता है। सच्ची मोहब्बत मां-पिता, परिवार समाज के हर किसी के दिल को जीत लेती है। उसमें सिर्फ मुस्कान होती है...वह विरोध करके कोई जंग जीतना नहीं जानती। मोहब्बत की जंग तो विरोध से कतई नहीं जीती जाती। हालांकि इस फिल्म में तो अटूट प्रेम का वादा करने के बाद भी मोहब्बत परवान नहीं चढ़ पाती है। 'वासु और सपना' अंत में फिल्म में मौत को लगे लगा लेते हैं। यहीं उनके मोहब्बत की जीत है। वह जीने के लिए कोई दूसरा आधार नहीं खोजते...कोई दूसरा आधार नहीं खोजना ही मोहब्बत की सच्चाई को दर्शाता है। बाकी तो दुनिया में काफी सौंदर्य बिखरा पड़ा है और दुनिया भी बहुत बड़ी है....
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