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अजी रूठकर अब कहां जाइएगा...विश्वास है तो खोना-बिछड़ना कैसा...

आरजू
                
                                                         
                            शब्दों के समंदर में तैरते हुए मानवीय संवेदनाओं को संजोये हुए गीतों की लड़ी में से आज एक बहुत ही भावुक गीत पर चर्चा की जाएगी। फ़िल्मों में कितने ही पॉपुलर फ़ॉर्मूले अपनाए गए हैं। ये सभी फ़ॉर्मूले अपने आपमें एक नया इफेक्ट होते हैं। नायक-नायिका कोमल भावों से अपने प्रेम ज़ाहिर करते हैं। हमारे गीतकार उन मनोभाव को बखूबी गीत या ग़ज़ल बनाकर हमारे सामने प्रस्तुत करते हैं।
                                                                 
                            

अजी रूठकर अब कहाँ जाईयेगा
जहाँ जाईयेगा, हमें पाईयेगा

निगाहों से छुपकर दिखाओ तो जाने
ख़यालों में भी तुम ना आओ तो जाने
अजी लाख परदों में छुप जाईयेगा
नज़र आईयेगा, नज़र आईयेगा

नज़र की जुबां से समझ जाईयेगा

1963 में आई फ़िल्म आरजू बहुत ही मशहूर हुई थी। फिल्म अपने अनमोल गानों की वजह से लोगों के दिलों में छा गई थी। यह वह दौर था जब प्रणय त्रिकोण की कहानियाँ और खूबसूरत आउटडोर लोकेशन लोगों को काफी अच्छे लगते थे। देश के सबसे खूबसूरत कश्मीर की वादियों को हमारे फ़िल्मकारों ने और भी खूबसूरत ढंग से पेश किया है। इस दौर में एक पार्टी गीत भी होता ही था। फैशन भी काफी लुभावना होता था।  

जो दिल में हैं होठों पे लाना भी मुश्किल
मगर उसको दिल में छुपाना भी मुश्किल
नज़र की जुबां से समझ जाईयेगा
समझकर ज़रा गौर फरमाईयेगा
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नज़र की जुबां से समझ जाईयेगा

7 वर्ष पहले

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