मैं सोई हुई क़िस्मत जगाने में रह गया,
रूंठा हुआ था कोई मनाने में रह गया।
वो झूठ बोलकर भी ख़ुदा-सा बना रहा,
मैं सच की एक शम्अ जलाने में रह गया।
वादों की धूप छाँव में कटती रही सदी,
हर शख़्स घर का दर्द छुपाने में रह गया।
कुर्सी बची तो मुल्क की फ़िक्रें बदल गईं,
हर फ़ैसला उन्हें ही बचाने में रह गया।
मज़हब की आग बाँट के रोटी समेट ली,
इंसान प्यार दिल में बसाने में रह गया।
संसद में शोर था कि बहुत काम हो गया,
मज़लूम अपना हक़ ही बताने में रह गया।
चेहरों पे मुस्कुराहटें सब इश्तिहार थीं,
आईना सच सभी को दिखाने में रह गया।
जो भी सवाल करता था हालात पर कभी,
इल्ज़ाम उसके सर ही लगाने में रह गया।
तारीख़ पूछती रही क़ुर्बानियों का मोल,
हाकिम नया हिसाब बनाने में रह गया।
हर बार वोट माँग के वादे बदल गए,
मासूम फिर यक़ीन दिलाने में रह गया।
जिसका नहीं था कुछ वो ख़ज़ाने निगल गया,
क़ानून हाथ मलता बचाने में रह गया।
सच बोलने की जुर्म में तन्हा हुआ कलम,
दरबार झूठ रोज़ सजाने में रह गया।
आवाज़ जब उठी तो उसे ख़ामोश कर दिया,
ज़ालिम नया निज़ाम चलाने में रह गया।
'ज़फ़र' लिखेगा हक़ की गवाही क़लम से ही,
दरबार उसको ख़ूब डराने में रह गया।
-ज़फ़रूद्दीन ज़फ़र
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