क्यूं हर शाम , यूं वीरानी हुई जाती है।
ये सोचकर , मुझे हैरानी हुई जाती है।।
दर्द उस मक़ाम पे, पहुंच गया आज।
दवा,जख़्म की दीवानी हुई जाती है।।
किस-किस को सुनाएं फसाने अपने।
ये दास्तां भी तो, पुरानी हुई जाती है।।
-यूनुस खान
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