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हां वो ही तेरे हैं, जिन्हें तू अपना समझे

                
                                                         
                            हम तो, मुद्दतों से मुंतजिर तेरे पैग़ाम के हैं।
                                                                 
                            
ये ना समझ , कि प्यासे किसी जाम के हैं।।

क़ासिद की पहचान करना,सीख लीजिए।
ये कबूतर कोई गैर नहीं,हमारी बाम के हैं।।

ये आबशार भी , अब साथ देते नहीं मेरा।
सच कहूं तो,ये समंदर भी बस नाम के हैं।।

राह-ए-हयात में गिरकर, खुद संभले हम।
तू बता दे,ये रहबर भी किसी काम के हैं।।

हद-ए-निगाह तक देखकर , ये लगता है।
ये लम्हें तो, किसी उजड़ी हुई शाम के हैं।।

रेत पर लिखी हुई इबारत पढ़ी, तो लगा।
ये निशां, पुरवाई झोंको के कयाम के हैं।।

तुम नाहक ही , दर-ए-चारागर तक गये।
मेरे ज़ख्म तो,बेवफाई के इल्ज़ाम के हैं।।

हां वो ही तेरे हैं, जिन्हें तू अपना समझे।
हम कब , हकदार तेरे इस ईनाम के हैं।।
-यूनुस खा
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45 मिनट पहले

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