हम तो, मुद्दतों से मुंतजिर तेरे पैग़ाम के हैं।
ये ना समझ , कि प्यासे किसी जाम के हैं।।
क़ासिद की पहचान करना,सीख लीजिए।
ये कबूतर कोई गैर नहीं,हमारी बाम के हैं।।
ये आबशार भी , अब साथ देते नहीं मेरा।
सच कहूं तो,ये समंदर भी बस नाम के हैं।।
राह-ए-हयात में गिरकर, खुद संभले हम।
तू बता दे,ये रहबर भी किसी काम के हैं।।
हद-ए-निगाह तक देखकर , ये लगता है।
ये लम्हें तो, किसी उजड़ी हुई शाम के हैं।।
रेत पर लिखी हुई इबारत पढ़ी, तो लगा।
ये निशां, पुरवाई झोंको के कयाम के हैं।।
तुम नाहक ही , दर-ए-चारागर तक गये।
मेरे ज़ख्म तो,बेवफाई के इल्ज़ाम के हैं।।
हां वो ही तेरे हैं, जिन्हें तू अपना समझे।
हम कब , हकदार तेरे इस ईनाम के हैं।।
-यूनुस खा
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X