अपनी-अपनी तलब के,तलबगार बहुत थे।
किसी ना किसी गर्ज के,पैरोकार बहुत थे।।
घर-आंगन की रौनकों के , मंज़र ना मिले।
कहने के लिए, मेले और बाजार बहुत थे।।
अपने ग़म को, अपने अश्कों से धो लिया।
अगरचे , ब-जाहिर मेरे ग़मख्वार बहुत थे।।
हर गली अजनबी की तरह देखती क्यूं है।
जबकि हर एक गली में मेरे यार बहुत थे।।
घर के नाम पर चंद निशां हैं आज, जहां।
दालानों के साथ दर-ओ-दीवार बहुत थे।।
-यूनुस खान
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