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ऐ नाखुदा,तू तूफ़ानों से यूं डरा ना हमे।

                
                                                         
                            ये सुबह-ओ-शाम, संवरते नहीं हैं अब।
                                                                 
                            
सितारे मेरे आंगन,उतरते नहीं हैं अब।।

तेरे जाने के बाद, सब्र आ गया हमको।
हम, हद-ए-दर्द से गुज़रते नहीं हैं अब।।

चिराग भी,हालातों से वाक़िफ हो गये।
उजाले,हर सिम्त बिखरते नहीं हैं अब।।

कितने भी अश्क , बहाएं हम हिज़्र के।
मुद्दत से,ये जख़्म निखरते नहीं हैं अब।।

मयकदे जाकर भी,जब प्यास न बुझी।
तो हम,खाली जाम भरते नहीं हैं अब।।

ऐ नाखुदा,तू तूफ़ानों से यूं डरा ना हमे।
हम, इन तूफ़ानों से, डरते नहीं हैं अब।।

तन्हाईयों की बज़्म, सजाकर खुश हूं।
दोस्त,घर का रूख़ करते नहीं हैं अब।।

मेरे उसूल , जिनसे मुझे मुकरने ना दें।
ऐसे वादे,किसी से करते नहीं हैं अब।।
-यूनुस खान
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 सप्ताह पहले

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