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कुरबत का वो मंज़र , याद आता है आज।

                
                                                         
                            हम मिले,मगर दरिया के किनारों की तरह।
                                                                 
                            
दरम्यां कुछ गिले खड़े थे,दीवारों की तरह।।

तवक्को-ए-शब-ए-वस्ल, दम तोड़ चुकी है।
हो गये हैं,खिंजा के मारे चिनारों की तरह।।

कुरबत का वो मंज़र , याद आता है आज।
जब रहते थे , नज़र और नज़ारों की तरह।।

वो चिराग, जिनसे रौशन था ये घर अपना।
टिमटिमा रहे हैं,यूं बुझते सितारों की तरह।।
-यूनुस खान
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36 मिनट पहले

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