हम मिले,मगर दरिया के किनारों की तरह।
दरम्यां कुछ गिले खड़े थे,दीवारों की तरह।।
तवक्को-ए-शब-ए-वस्ल, दम तोड़ चुकी है।
हो गये हैं,खिंजा के मारे चिनारों की तरह।।
कुरबत का वो मंज़र , याद आता है आज।
जब रहते थे , नज़र और नज़ारों की तरह।।
वो चिराग, जिनसे रौशन था ये घर अपना।
टिमटिमा रहे हैं,यूं बुझते सितारों की तरह।।
-यूनुस खान
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X