खामोशियों के मंज़र, हैं राज़दार घर के।
सन्नाटों से घिरे हैं, दर-ओ-दीवार घर के।।
गुफ्तगू से मिटा लेते हैं, ये गिले-शिकवे।
उठाना ना मुद्दे, यूं सर-ए-बाज़ार घर के।।
-यूनुस खान
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