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फूल ही नहीं

                
                                                         
                            फकत फूल ही नहीं,खार भी अच्छे लगते हैं।
                                                                 
                            
मुझे , मतलब परस्त यार भी अच्छे लगते हैं।।

अगरचे, हर वक्त ग़ुलाबों के साये में रहा हूं।
मगर,ये दरख़्त-ए-चिनार भी अच्छे लगते हैं।।

हर सिम्त बज़्म-ए-तरब हो , जरूरी नहीं है।
मुझको तो वीराने दयार भी अच्छे लगते हैं।।

कुरबतों ने भी बख्शी है बस तन्हाई हमको।
यूं ही, फांसले-ओ-दरार भी अच्छे लगते हैं।।

ग़म-ए-हिज़्र की आग में , जला हूं मैं तन्हा।
मगर फिर भी, ये गमख्वार अच्छे लगते हैं।।

झूठा ही सही,वस्ल का कोई वादा तो कर।
अक्सर , मुझे ये करार भी अच्छे लगते हैं।।

मयकशी भी, कंहा से कंहा ले आयी मुझे।
फिर क्यूं,सुरूर-ओ-खुमार अच्छे लगते हैं।।
-यूनुस खान
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2 महीने पहले

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