दरम्यां वो कोई दीवार चाहता है।
कुरबतों में, अब दरार चाहता है।।
साफगोई से, ये बताता भी नहीं।
फांसलों का, पैरोकार चाहता है।।
उजालों से , दूर होता जा रहा है।
शायद, गर्द-ओ-गुबार चाहता है।।
अपनों में, गैरों को देखता है वो।
मगर,जीतना एतबार चाहता है।।
-यूनुस खान
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