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वैसे लबों पे है,कीमत-ओ-दाम के किस्से।।

                
                                                         
                            ये सफ़र और मंज़िल-ओ-मकाम के किस्से।
                                                                 
                            
तपते लबों की प्यास, और जाम के किस्से।।

क्या करते, हम मुहब्बत के रिसाले पढ़कर।
हर सफहे में छिपे थे,ये तेरे नाम के किस्से।।

वो गुज़रे वक्त के मंज़र,भूल जाऊं मैं कैसे।
याद दिला देती है सहर,वो शाम के किस्से।।

खुद की हौसला-अफजाई, खुद करुं कैसे।
याद हैं हर आगाज़ को, अंजाम के किस्से।।

ख़ामोशियों से ये कैसी आवाज आ रही है।
हवा सुना रही है,किसी गुमनाम के किस्से।।

मेरी बरबादियों का जश्न,मनाते हैं रोज वो।
जो गा रहे हैं, गर्दिश-ए-अय्याम के किस्से।।

अपनी थकन की चादर ओढ़ लेता हूं खुद।
क्या करना सुनकर मुझे,कयाम के किस्से।।

मेरे ग़म का ख़रीदार कोई नहीं है दिखता।
वैसे लबों पे है,कीमत-ओ-दाम के किस्से।।

-यूनुस खान
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एक महीने पहले

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