खत-ओ-चिट्ठी तार के, ज़माने कहां गये।
डांक और इंतजार के, ज़माने कहां गये।।
बदलते वक्त ने , सब कुछ बदल दिया।
वो गिल्ली-डंडे,यार के ज़माने कहां गये।।
एक सी लगती है, सुबह-शाम शहर की।
वो फाल्गुनी बयार के,ज़माने कहां गये।।
जिसकी शाखों पे, नशेमन थे परिंदों के।
दरख़्त-ओ-चिनार के, ज़माने कंहा गये।।
अगरचे, हर सिम्त उजाले हैं अब, मगर।
चिराग़ों की कतार के,ज़माने कहां गये।।
-यूनुस खान
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