मुस्कान मेरे लबों की, यूं सबको खल गयी।
बरसों से नासाज़, जो तबियत संभल गयी।।
घर के दर-दरीचों को अंधेरे बहुत पसंद हैं।
आंगन दुखी हुआ क्यूं ये शम्मा जल गयी।।
-यूनुस खान
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X